चीन ने इरान के साथ वार्ता में हॉर्मुज जलडमरूमध्य को जल्द से जल्द पुनः खोलने का आग्रह किया
बीजिंग के मुख्य विदेश मंत्री वांग यी ने इस सप्ताह इरान के विदेश मंत्री एरागही के साथ बातचीत की, जिसमें उन्होंने हॉर्मुज जलडमरूमध्य को "जितना जल्द हो सके" पुनः खोलने की महत्त्वपूर्ण मांग रखी। एरागही की चीन यात्रा इराण में चल रहे युद्ध के आरम्भ के बाद पहली है, जिससे द्विपक्षीय रिश्तों में एक नया मोड़ आया है।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जो विश्व के सबसे व्यस्त तेल मार्गों में से एक है, अब कई महीनों से सैन्य गतिरोध और सुरक्षा चिंताओं के कारण बंद है। चीन का यह सार्वजनिक आग्रह सतह पर आशावादी प्रतीत होता है, परन्तु उसके पीछे रणनीतिक आर्थिक स्वार्थ स्पष्ट है—चीन अपनी ऊर्जा आयात में 70% से अधिक मध्य पूर्व के तेल पर निर्भर करता है, और बंदरगाह के निरंतर बंद होने से उसकी निर्यात‑आधारित अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ता है।
भारत के लिए भी यह मुद्दा अत्यधिक संवेदनशील है। भारत का लगभग 15% तेल आयात हॉर्मुज के माध्यम से आता है, और जलडमरूमध्य के बंद होने से भारतीय रिफाइनरियों को वैकल्पिक, महँगी समुद्री मार्गों पर निर्भर रहना पड़ता है। इस कारण, भारतीय नीति निर्माताओं ने भी अभिरुचिकर रूप से इस बहस को करीब से फॉलो किया है, जबकि सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं दी गई।
डिप्लोमैटिक शब्दावली में अक्सर “सभी पक्षों के बीच मिलजुल कर समाधान” जैसा वाक्यांश दिखाई देता है, पर वास्तविकता में यह वाक्य अक्सर केवल कूटनीतिक शिष्टाचार रहता है। चीन, जिसने अपने स्वयं के समुद्री रक्षा बल को बीच‑बीच में प्रकट किया है, अभी भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में पश्चिमी बहस में कम आवाज़़ रखता है। इसी प्रकार, अमेरिकी प्रतिबंधों के तहत इरान के तेल निर्यात को दबाने के प्रयासों पर चीन का समर्थन या विरोध स्पष्ट रूप से नहीं दिखाता।
वांग यी का यह बयान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय शक्ति संतुलन में चीन की भूमिका को उजागर करता है—एक ऐसा देश जो शांती के मुखौटे को अपनाते हुए भी अपने आर्थिक हितों को प्राथमिकता देता है। यदि जलडमरूमध्य जल्द ही बिना किसी ठोस सुरक्षा प्रोटोकॉल के फिर खुलता है, तो यह उन कूटनीतिक शब्दों और वास्तविक कार्यों के बीच की खाई को और स्पष्ट कर देगा, जिससे न केवल मध्य पूर्व, बल्कि भारत और विश्व के ऊर्जा बाजारों में नई अनिश्चितताएँ उत्पन्न होंगी।
Published: May 6, 2026