चीन की पवन ऊर्जा पर बड़ी दांव: सब्सिडी और आयात प्रतिबंधों से मिली दोहरी शक्ति
पिछले पाँच वर्षों में चीन ने पवन शक्ति क्षेत्र में वह गति पकड़ी है, जो कभी सौर ऊर्जा के बगल में केवल असमान भागीदार था। सरकारी उद्योग नीति ने निरंतर सब्सिडी और कड़े आयात प्रतिबंधों को मिलाकर घरेलू पवन टरबीन निर्माताओं को एक प्रीमियम बॉक्स में पाँचा, जहाँ वे बिना किसी प्रतिस्पर्धी के समान उत्पाद बना सकें। परिणामस्वरूप चीन अब पवन टरबीन निर्यात में सौर पैनल की तरह ही प्रमुख बन गया है।
सरकार की सहायता पैकेज दो गुना है: उत्पादन इकाइयों को प्रतिपूर्ति देने वाले प्रत्यक्ष व्यय, और साथ ही पवन उपकरणों के घटकों पर 25 % तक के आयात टैरिफ़। 2021 में शुरू हुए ‘स्थानीय सामग्री’ आदेश ने विदेशी निर्माताओं को अपनी कीमतें घटाने या भारत के समान स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने में बाधित किया, जबकि घरेलू कंपनियों को तेज़ी से स्केलेबल फैक्ट्रियों की नींव देने का अवसर मिला। इन उपायों ने चीन के टरबीन उत्पादन को 2025 तक 300 GW तक पहुँचाने की लक्ष्यव्याख्या को साकार किया।
विश्व स्तर पर यह विकास कई दोधारी तलवारें ले आया है। अमेरिका और यूरोपीय संघ ने इस नीतिके पतन की ओर इशारा किया, आरोप लगाया कि वह मुक्त व्यापार के सिद्धांतों के विपरीत एक "उच्च संरक्षणवाद" का उदाहरण है। साथ ही, विश्व भर में पवन ऊर्जा की लागत में लगातार गिरावट देखी गई, पर अब कीमतें चीन के नियत्रित बाजार में संकुचित हो रही हैं, जिससे नवोदित खिलाड़ियों के लिए प्रवेश बाधा बढ़ रही है। इस परिप्रेक्ष्य में, चीन के विकास मॉडल ने वैश्विक सप्लाई चेन में नई असमानताएँ पैदा की हैं, जबकि जलवायु लक्ष्यों की बात होते‑हुए भी संरक्षणवाद की टोकरी में बँटे नीतियों का विरोधाभास स्पष्ट हो रहा है।
भारत के लिए यह स्थिति दो तरह से महत्त्वपूर्ण है। एक ओर, चीन के सस्ते टरबीन हमारे बड़े‑पैमाने पर हो रहे पवन परियोजनाओं के प्रतिस्पर्धी बन रहे हैं, जिससे आयात लागत में कमी का संभावित लाभ मिल सके। दूसरी ओर, यदि घरेलू निर्माताओं को समान सब्सिडी नहीं मिलती, तो वे निर्यात‑उन्मुख चीनी प्रतिद्वंद्वियों के सामने अतिचालान रहेंगे। भारत के वर्तमान पवन लक्ष्य (2025 तक 60 GW) को हासिल करने के लिए स्थानीय उत्पादन को बूस्टर देना अनिवार्य होगा, नहीं तो हम वही आयात‑निर्भरता दोहराएंगे, जो कई साल पहले सौर क्षेत्र में देखी गई थी।
नीति-वाक्य और वास्तविक समर्थन के बीच की दूरी इस बात की साक्षी है कि बँटे‑बँटे शब्दजाल के बाद भी सरकारें अक्सर अपने ही हितों को प्राथमिकता देती हैं। चीन का यह दोहरा खेल—जलवायु प्रतिबद्धताओं का सार्वजनिक रूप से समर्थन और साथ ही घरेलू उद्योग को संरक्षण—एक समय में प्रभावशाली, लेकिन दीर्घकालिक टिकाऊ विकास की परिकल्पना से दूर दिखता है। सिलिकॉन वैली में जितनी तेज़ी से नवाचार होता है, वहीं एशिया के बड़े आर्थिक खिलाड़ियों में नीति‑निर्धारण का “सुरक्षा‑नवीनीकरण” मोड भी स्पष्ट हो रहा है। इस जटिल परिदृश्य में भारत को सतर्क रहना होगा, न कि केवल लागत में बचत, बल्कि निरंतर तकनीकी आत्मनिर्भरता का मार्ग प्रशस्त करना होगा।
Published: May 5, 2026