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Category: दुनिया

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चीन-ईरान वार्ता: हमेज़ जलडमरूमध्य को खोलने पर अमेरिकी दबाव और संभावित तनाव

बीजिंग के वरिष्ठ कूटनैतिक प्रतिनिधि ने 6 मई को TEHRAN में ईरान के विदेश मंत्री के साथ बैठक में हमेज़ जलडमरूमध्य के पुनःउघाड़ने की मांग को पुनः उठाया। अमेरिकी कूटनीतिक दायरे से घिरा यह संवाद, अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा बाजार और क्षेत्रीय सुरक्षा दोनों में नई जटिलताएँ जोड़ता दिखता है।

संयुक्त राज्य अमेरिका ने पहले ही चीन से आग्रह किया है कि वह ईरान पर दबाव बनाए, ताकि इस रणनीतिक जलडमरूमध्य को शीघ्र पुनः खोल दिया जाए। अमेरिकी बयानों का अक्सर यह तर्क रहता है कि ‘वैश्विक तेल प्रवाह के ठहराव से विश्व अर्थव्यवस्था पर गंभीर असर पड़ेगा’। वहीं, बीजिंग ने वार्ता में ईरान को ‘पुनः संघर्ष की ओर कदम बढ़ाने से बचने’ की चेतावनी दी – मानो दो पड़ोसी बिल्लियों की तरह, दोनों एक-दूसरे के पास आते तो हैं, पर खींच-तान से बचते हैं।

हमेज़ स्ट्रेट विश्व की कुल तेल निर्यात का लगभग 20 प्रतिशत ले जाता है। इसका बंद होना सिर्फ मध्य पूर्वी तेल आयातकों को ही नहीं, बल्कि दूर‑दूर तक फैले शिपिंग कंपनियों को भी नुकसान पहुँचाता है। भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि उसका लगभग 80 प्रतिशत कच्चा तेल आयात इस जलडमरूमध्य के माध्यम से होता है। यदि जलडमरूमध्य अवरुद्ध रहता है, तो भारतीय तेल कंपनियों को अधिक महंगी वैकल्पिक मार्ग—जैसे कि अफ्रीकी किनारों के आसपास का ‘कैप केप रूट’—अपनाने पड़ेंगे, जिससे उपभोक्ता कीमतों में सीधा उछाल आएगा।

डिप्लोमैटिक स्तर पर चीन की स्थिति दोधारी तलवार जैसा दिखता है। एक ओर वह ईरान के साथ ऊर्जा सुरक्षा, रणनीतिक गठबंधन और बाय‑डिफॉल्ट तेल समझौतों के लिए निकटता बढ़ा रहा है। दूसरी ओर, वह अमेरिका के ‘वास्तविकता को बदलने’ वाले दबाव को ना तो outright खारिज कर रहा है और ना ही पूरी तरह स्वीकार कर रहा है। यह नाज़ुक संतुलन, चीन की ‘ऍस-इज़’ नीति को बयां करता है, जिसमें वह वैश्विक मंच पर ‘सहयोगी’ बनने का दावा करता है, जबकि बेकाबू शक्ति के प्रयोग से अभिप्रायों को मोटा कर देता है।

संस्थागत आलोचना से बचना मुश्किल है। जबकि बीजिंग अक्सर ‘विचार‑विमर्श की इच्छा’ और ‘क्षेत्रीय स्थिरता’ के शब्दों में लिपटे रहना पसंद करता है, वास्तविक कार्य‑क्षेत्र में उन वादों की पूर्ति बहुत हद तक आर्थिक हितों से बंधी हुई दिखती है। इसी प्रकार, अमेरिकी कूटनीति भी अक्सर ‘दबाव’ शब्द का इस्तेमाल करती है, पर उसका अपना ‘छिद्रयुक्त वाणिज्यिक हथियार’ – प्रतिबंध और सिलिकॉन वैली कंपनियों की तकनीकी एक्सपोर्ट नियंत्रण – अनजाने में अंतरराष्ट्रीय व्यापार को अस्थिर कर रहा है।

परिणामस्वरूप, इस वर्ष के मध्य में हमेज़ जलडमरूमध्य के दोबारा खुले या बंद रहने का प्रश्न अभी भी अनिश्चित बना हुआ है। यदि चीन और ईरान के बीच समझौता साधा जाता है, तो संभवतः एक ‘चलो‑ठीक‑ठाक’ स्तर की खोल देनी होगी, जिसमें अमेरिकी दबाव के बावजूद ईरान को कुछ रणनीतिक लीवर मिलेंगे। वैकल्पिक रूप से, यदि अमेरिका अपना ‘रिवॉल्वर‑वॉल्‍प’ दबाव जारी रखता है, तो वह चीन को ‘भू‑राजनीतिक संतुलन’ के तहत एक अनिच्छुक मध्यस्थ बना सकता है, जो अंततः भारतीय समुद्री हितों के लिए निरंतर अनिश्चितता का कारण बनेगा।

Published: May 6, 2026