कोलंबिया के जलहिप्पो को अणित अंबानी के वँटारा में ले जाना: समाधान या कल्पनात्मक शोर?
कोलंबिया में पाब्लो एस्कॉबार के निजी अभयारण्य से बच निकले चार जलहिप्पो अब 80 से अधिक तक बढ़ चुके हैं। ये बड़े बेज़ल आकार के पाद जीव, जो मूलतः अफ्रीका के धुतर-सीन में रहने वाले होते हैं, ने अमेज़न की नदियों को अपना घर बना लिया है। बढ़ते जनसंख्या के कारण स्थानीय मछलियों, जलजीवों और यहाँ तक कि मछली पकड़ने वाले समुदायों पर प्रतिकूल असर दर्ज किया गया है। सरकारी अधिकारियों ने कई बार नसबंदी और फिर विनाश की कोशिश की, पर परिणाम असंतोषजनक रहे, जिससे कड़ाई से 30‑40 हिप्पो को मारने की योजना को अंततः अपनाया गया।
इसी बीच, भारतीय उद्योगपतियों के निजी अभयारण्यों में से एक – अणित अंबानी की ‘वँटारा’ – को इस समस्या का "वैश्विक समाधान" माना जाने लगा। मीडिया में यह खबर आ गई कि वँटारा 80 अतिरिक्त जलहिप्पो को अपने 300 वर्ग किलोमीटर के बायो‑डोमेन में समायोजित कर सकता है। यह सुझाव, उन लोगों को आकर्षित करता है जो भारत में अभयारण्य परियोजनाओं को राजनैतिक आश्रय देना चाहते हैं, परंतु वास्तविकता कहीं अधिक जटिल है।
पहला सवाल – क्या भारतीय कानून इस प्रकार के गैर‑देशीय प्रजनन को अनुमति देता है? वन्यजीव संरक्षण अधिनियम (2002) और विदेशी प्रजातियों के आयात पर सख्त प्रतिबंध, विशेष रूप से सीएसटीईएस (CITES) के तहत विनियमित प्रजातियों के लिए, विदेश से किसी भी बड़े मवेशी को लाने की प्रक्रिया को व्यावहारिक रूप से असंभव बनाते हैं। आयात परमिट, शून्य‑रोग‑रही क्वारंटाइन, और संभावित अंतर्वैश्विक रोगों की जाँच के लिए करोड़ों रुपये खर्च होंगे।
दूसरा, जलहिप्पो की जैविक जरूरतें वँटारा की मौजूदा परिस्थितियों से मेल नहीं खातीं। कोलंबिया की बरसात वाली जलवायु, जहाँ पानी का स्तर साल भर दो‑तीन मीटर तक बढ़ता‑घटता रहता है, भारत के जयपुर‑के पास स्थित थर्मल‑ड्राई ज़ोन से बहुत अलग है। यहाँ के तापमान, जलधारा और पोषण श्रृंखला अलग‑अलग हैं; अतः इनकी अनुकूलता पर कोई भरोसा नहीं है।
तीसरा, यदि इस विचार को लागू किया भी जाता है, तो भारत को संभावित नई आक्रमणकारी प्रजातियों से निपटना पड़ेगा। भारतीय सेना ने पहले ही अफ्रीकी वाइल्डइवों के अवैध आयात को रोकने में कठिनाइयों को उजागर किया है; अब एक बड़े मवेशी को आधे द्वीप पर स्थापित करना, रौद्रक योजना जैसी बात है। इस पर सरकारी पर्यावरण विभाग की प्रतिक्रिया अक्सर “ब्यूरोक्रेसी के झंझट” से बचने की ओर झुकती रहती है, जबकि स्थानीय एंटी‑पॉइज़न समूहों ने इस पर चेतावनी जारी की है।
भौगोलिक और कानूनी बाधाओं के बीच, इस प्रस्ताव की अंतर्निहित राजनीति स्पष्ट होती है। कोलंबिया की सरकार, जिसकी पर्यावरणीय नीतियों पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की आलोचना रहती है, अब "रिकलिंग" के बहाने से कुछ कर सकते नहीं दिखता, जबकि दलदल में डूबे हुए आलोचक इसे "रोकथाम की बकवास" कह रहे हैं। वहीं भारत में, जहाँ टाइगर और एस्परागस जैसी प्रजातियों की सुरक्षा के लिए बजट संघर्ष जारी है, एक निजी अभयारण्य को विदेशी समस्या का संग्रहालय बनाना, न केवल असंगत है बल्कि सामाजिक असमानताओं को भी उजागर करता है।
यदि विचारधारा के बजाय व्यावहारिकता का रवैया अपनाया जाए, तो जलहिप्पो की समस्या का समाधान सहयोगी अंतर्राष्ट्रीय संरक्षण कार्यक्रमों, स्टेटस‑कोटा के तहत नियंत्रित ब्रीडिंग और वैध जैविक प्रबंधन से निकाला जा सकता है। वर्तमान प्रस्ताव, जो प्रमुख व्यापारियों को निजी जंगलों में "असुरक्षित ऐतिहासिक हिप्पो" रखने की अनुमति देता है, वह नीति‑घोषणाओं और वास्तविक परिणामों के बीच के अंतर को स्पष्ट रूप से दिखाता है – जहाँ शब्दों में मानवीय भावना, लेकिन कदमों में नौकरशाही का अटकाव।
Published: May 4, 2026