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Category: दुनिया

कैलिफ़ोर्निया, एरिज़ोना, नेवादा ने कोलोराडो नदी के जल संकट को टालने के लिये तीन साल की स्वैच्छिक बचाव योजना पेश की

पश्चिमी संयुक्त राज्य में 40 मिलियन लोगों को पानी पहुँचाने वाला कोलोराडो नदी अंततः दो विशाल जलाशयों – लेक मीड और लेक पॉवेल – के ऐतिहासिक नीचे स्तरों का सामना कर रहा है। अतः कैलिफ़ोर्निया, एरिज़ोना और नेवादा ने अगले तीन वर्षों के लिये एक स्वैच्छिक जल‑बचत उपायों का खाका तैयार किया है, जिसका उद्देश्य परस्पर‑परिणामकारी वार्तालापों के ठहराव के बीच समय खरीदना है।

प्रस्ताव में कृषि, शहरी उपयोग और जल‑ऊर्जा सुविधाओं में प्रतिवर्ष औसतन 2‑3 % की कमी शामिल है। यह कटौती ‘स्वैच्छिक’ कहलाती है, परन्तु वास्तविकता में यह राज्य सरकारों पर असंगत जल‑प्रबंधन प्रणालियों को सुधारने का एक अप्रत्यक्ष दबाव है – विशेषकर उन क्षेत्रों में जहाँ जल अधिकार पहले से ही जमीनी स्तर पर बाँट‑बाँट कर ठहराए गये थे।

कोलोराडो नदी के दो प्रमुख जलाशयों की स्थितियों को समझना आवश्यक है। 2023‑2025 के बीच मीड की जल‑स्तर 31 % और पॉवेल की 27 % तक गिर गई, जो पिछले दशक में देखी गयी न्यूनतम परिदृश्य है। प्रमुख कारण हैं – निरंतर अधिक निकासी, कम बर्फीली जलधारा, और जलवायु‑परिवर्तन की तेज़ी से बढ़ती गर्मी। यह सिर्फ़ स्थानीय समस्या नहीं; समान जल‑संकट भारत के हिमालयी जल‑ग्लेशियरों, ऑस्ट्रेलिया के ‘बैरिन’ जल‑प्रणालियों और चीन‑इज़राइल की सूखी नदियों में भी अभिव्यक्त होते हैं।

अमेरिकी फेडरल सरकार ने इस मुद्दे पर कई बार मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया, परन्तु सख़्त जल‑हक़ अधिकारों की पुरानी परतों और जल‑बाजारों के निजी‑राज्य गठजोड़ों की जटिलता ने किसी भी ठोस समझौते को रोक दिया है। इस कारण, तीन राज्य अब ‘स्वैच्छिक’ उपायों को प्राथमिक रणनीति मान रहे हैं – एक प्रक्रिया जिसे देख कर भारतीय जल‑प्रशासन के कई आलोचक मुस्कुराते हुए कहेंगे, “चाय की चुस्की लेते‑लेते ही जल‑बचत ही बचत”।

वैश्विक संदर्भ में, कोलोराडो नदी की स्थिति एक चेतावनी घड़ी के समान बज रही है। अंतर्राष्ट्रीय जल‑संघर्षों के बढ़ते परिदृश्य में, जल‑आवश्यकता को राजनीतिक शक्ति के साथ जोड़ना किसी भी सरकार के लिए ‘जैविक‑राजनीतिक’ टॉक्सिकता से बचने का इंतजाम बन गया है। इस योजना का उल्लेखनीय पक्ष यह है कि यह कांग्रेस के ‘क्लायमेट‑डेलीगेट’ प्रस्तावों से स्वतंत्र है, इसलिए अक्सरं ‘अस्थायी समाधान’ के टैग में छिपा रहता है, जबकि वास्तविक प्रतिबंधात्मक नीतियों की कमी बरकरार रहती है।

यदि इस ‘स्वैच्छिक’ कमी को सफलतापूर्वक लागू किया जाता है, तो अगले तीन साल में जल‑स्तर में थोड़ी‑सी चढ़ाव की आशा की जा सकती है। लेकिन विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि बिना फ़ेडरल‑स्तर की दृढ़ निगरानी और जल-परिदृश्य‑सिमुलेशन के यह उपाय केवल एक ‘प्लास्टर’ है – मरीज की अस्थायी राहत के बजाय मूल रोग का इलाज नहीं।

भारतीय पाठकों के लिये इस विकास की दोहरी महत्ता है। एक ओर, अमेरिका में जल‑प्रबंधन की असफलता हमारे अपने ‘जल‑संकट’ के तर्क को मजबूती देती है; दूसरा, यह एक सीख भी देता है कि बहु‑राज्य/प्रदेशीय सहयोग में ‘स्वैच्छिक’ शब्द को अक्सर ‘संस्थागत’ दआवों के साथ मिलाकर प्रयोग किया जाता है, जो अंततः बड़ी नीति‑निर्माण प्रक्रिया को टाल‑टूट कर रखता है।

सॉरता, अथाह जल‑संकट के सामने, तीन राज्य की ये पहल एक ‘समय‑खरीद’ की कोशिश हो सकती है, परन्तु वास्तविक समाधान की दिशा में कदम तभी बढ़ेगा जब फेडरल‑राज्य तालमेल, जल‑बाजारों की पारदर्शिता, और जल‑पर्यावरणीय रक्षण को एक सुदृढ़ ढाँचे में बदला जाये। तब ही कोलोराडो नदी की ‘बढ़ती’ लहरें फिर से जल‑स्रोत‑सुरक्षा की ध्वनि दे पाएँगी।

Published: May 4, 2026