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Category: दुनिया

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कोरियाई आपील कोर्ट ने पूर्व प्रधानमंत्री की सजा घटा कर 15 साल कर दी

संपूर्ण एशिया के लोकतांत्रिक आदर्शों को झकझोरते एक निर्णायक फैसले में दक्षिण कोरियाई आपील कोर्ट ने 2024 के अंत में राष्ट्रपति यूं सुक‑योल द्वारा लागू कराए गए मार्शल लॉ में संलिप्त पूर्व प्रधानमंत्री को 15 साल कारावास की सजा सुनाई। यह पुनर्विचार उनके शुरुआती सात साल के कारावास के आदेश को आधा कर देता है, परंतु सजा की कठोरता को बरकरार रखता है।

मार्शल लॉ, जो अप्रैल‑मे 2024 में देश के भीतर उभरते राजनैतिक असंतोष को आँकड़े के रूप में फॉर्मल रूप से बंद करने की कोशिश थी, ने न केवल नागरिक स्वतंत्रताओं को प्रतिबंधित किया, बल्कि सैन्य शासन के संकेत भी दिए। उस समय यूं सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर आपातकालीन कानूनी ढाँचों को सक्रिय किया, जबकि विदेश नीति के मोर्चे पर यू.एस.‑कोरिया गठबंधन पर भरोसा करने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय समुदाय से गंभीर निंदा झेलनी पड़ी।

पूर्व प्रधानमंत्री, जो तब राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख थे, पर आरोप लगा कि उन्होंने राष्ट्रपति को वैधता प्रदान करने के लिये अनुचित दस्तावेज़ तैयार किए और संवैधानिक उपायों को दरकिनार किया। प्रथम श्रेणी की अदालत में उनका 2025 में दोषसिद्धि हुई, पर अब आपील कोर्ट ने दलील दी कि मूल सजा में न्यायिक प्रक्रियात्मक त्रुटियाँ थीं, जिससे समय-समय पर सजा कम कर दी गई। यह निर्णय कानूनी तकनीकियों के प्रयोग से न्यायिक दायित्व को पेपर पर ही सीमित कर देता है—एक ऐसी प्रक्रिया जो अक्सर विकासशील लोकतंत्रों में देखी जाती है, जहाँ न्यायपालिका को राजनीतिक दबावों से मुक्त रखने की चुनौती बनी रहती है।

इस फैसले के तत्काल प्रभाव स्पष्ट हैं: दक्षिण कोरिया के भीतर लोकतांत्रिक संस्थानों को एक झटका लगा है, जबकि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को राजनीतिक जोखिम का पुनर्मूल्यांकन करना पड़ेगा। यू.एस. के साथ सुरक्षा सहयोग जारी रहने की संभावना है, परन्तु दोनों देशों के बीच भरोसा अब पहले जैसा नहीं रह सकता। भारत के लिए यह एक सतर्क संकेत है—वित्तीय और तकनीकी साझेदारियों के साथ-साथ सुरक्षा ढाँचे को सुदृढ़ करने में कोरिया की आंतरिक अस्थिरता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भले ही 15 साल की सजा घटा दी गई हो, यह मामले की बुनियादी समस्या—राजनीतिक शक्ति को आपातकालीन प्रावधानों के तहत वैध ठहराना—अभी भी अनसुलझी है। अदालत का यह ‘संविधानिक सफाई’ का दिखावा एक सूखा व्यंग्य की तरह प्रतीत होता है, जिसमें वास्तविक सुधार की गहरी जड़ें नहीं उकेली गईं। इस प्रकार, दक्षिण कोरियाई न्यायिक प्रणाली, जो अक्सर अपने अधिकार को सिद्ध करने के लिए ‘कभी‑कभी’ अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों को टालती रही है, अपने ही नियमों पर घुटन का सामना कर रही है।

दूरदर्शी नीति निर्माताओं को इस बात पर पुनर्विचार करना चाहिए कि मार्शल लॉ जैसी अस्थायी शक्ति संरचनाएँ कब तक लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों की रक्षा के नाम पर उपयोग में लायी जा सकती हैं। अन्यथा, कोरिया की राजनीतिक यात्रा में ऐसी ही कई ‘सजा घटाने’ की कहानियाँ जुड़ सकती हैं, जो केवल शब्दों में सुनहरी पर वास्तविकता में हल्की-फुल्की राहत बन कर रह जाएँगी।

Published: May 7, 2026