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केन्या में कैंसर क्लस्टर को ‘पर्यावरणीय नरसंहार’ का लेबल, तेल‑अपशिष्ट के पीछे का सच
केन्या के उत्तरी भाग में स्थित कर्गी गाँव के निवासियों ने हाल ही में एक ‘पर्यावरणीय नरसंहार’ की अवधारणा को सार्वजनिक किया है। उनका दावा है कि 1980 के दशक में तेल अन्वेषण के दौरान टेंडर‑ड्रॉप की तरह बिखरे गए विषाक्त अपशिष्ट आज‑कल कैंसर के घातक क्लस्टर का स्रोत बन गया है।
स्थानीय स्वास्थ्य क्लिनिकों में दर्ज किए गए कैंसर केसों की दर राष्ट्रीय औसत से पाँच गुना अधिक है। यह आँकड़ा एक अनाम चिकित्सा सर्वेक्षण में स्पष्ट हुआ, जिसे कर्गी के ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं ने स्वयं आयोजित किया था। विशिष्ट रूप से पेट, फेफड़े और त्वचा के कैंसर में वृद्धि देखी गई, जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि वायु‑भू-जल प्रतिकूलता का समुच्चय है, न कि कुछ ही मामलों का संयोग।
इस घटना के पीछे मुख्य संदिग्ध 1980‑के दशक में शुरू हुई तेल खोजी परियोजना है, जिसमें बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियों ने एकत्रित भू‑भौतिक डेटा के बदले बड़ा‑बड़ा केंद्रीय डम्पिंग साइट स्थापित किया। निकासी के बाद भी इन साइटों से जहरीले हाइड्रोकार्बन, क्षारीय धातुएँ और सॉल्वेंट रिसते रहे, परन्तु स्थानीय पर्यावरणीय नियामक, जो अक्सर बजट की कमी से जुझते हैं, ने इसका उचित दस्तावेजीकरण या साफ‑सफाई नहीं की।
केन्याई सरकार ने अभी तक इस मुद्दे पर ठोस कदम नहीं उठाए हैं। जब पत्रकारों ने आधिकारिक बयान की माँग की, तो स्वास्थ्य मंत्रालय ने “वर्तमान में कोई औपचारिक जांच नहीं चल रही” कहा, जबकि पर्यावरण मंत्रालय ने “आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी लापरवाह कार्य की सख्त परीक्षा होगी” का आश्वासन दिया – एक वाक्य जो सालों से कई बार दोहराया जाता है लेकिन असल में जमीन पर नहीं उतारता।
वहीं, विदेशी तेल कंपनियों ने इस मामले को “स्थानीय स्वास्थ्य निगरानी की कमी” के संदर्भ में ढाला है, यह दावा करते हुए कि उन्होंने “सभी लागू अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण मानकों का पालन किया”। यह बयान सुनकर कोई भी सिविल समाज का सदस्य नहीं कहेगा, “धन को तोड़‑फोड़ कर दिया, फिर शोषण से बचने के लिये मानक बनवाए”।
उफ़, यह वही अँधेरा है जो भारत में भी कभी‑कभी दोहराया जाता है। भारत के तेल‑क्षणिक क्षेत्रों, जैसे असम, गुजरात और कारगिल‑लद्दाख में भी पाई जाने वाली धातु‑आधारित खनन‑उत्पादन समस्याएँ इसी वर्गीकरण के तहत आती हैं – ‘पर्यावरणीय स्वास्थ्य लापरवाही’, यदि हम बात को सच्चे दिल से कहें तो ‘पर्यावरणीय नरसंहार’। भारतीय नियामक निकाय, विशेषकर कंसलिडेटेड फिशनरी डिपार्टमेंट (CFD) तथा पर्यावरण नीति आयोग, अक्सर बायो‑डायवर्सिटी संरक्षण के बड़े‑बड़े प्रदर्शन करते हैं, परन्तु स्थानीय स्तर पर होने वाले स्वास्थ्य संकटों को काफी हद तक अनदेखा किया जाता है।
वैश्विक स्तर पर यह मामला पर्यावरणीय न्याय के बहस को फिर से गरम कर रहा है। संयुक्त राष्ट्र के मानव अधिकारों की घोषणा में पर्यावरणीय स्वास्थ्य को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता दी गई है, परन्तु इस अधिकार को संरक्षण देने में अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों की पहुँच अभी भी ‘रिवर्स एरियल’ में है। इसी कारण विभिन्न देशों में ‘पर्यावरणीय शरणार्थी’ की अवधारणा अब थेरेपी के तौर पर उभर रही है।
परिणामस्वरूप, कर्गी के लोग अब न केवल अपने स्वास्थ्य के लिए अपील कर रहे हैं, बल्कि वे अंतरराष्ट्रीय पर्यावरणीय न्याय मंचों में अपनी आवाज़ उठाना चाहते हैं। कुछ समुदाय के प्रतिनिधियों ने एक संयुक्त बैनर तैयार किया है, जिस पर लिखा है: “एक ही धूल, दो हजार साल बाद भी कैंसर का पकवान” – यह बयान यह दर्शाता है कि समय के साथ स्याही धूमिल हो सकती है, परन्तु विषाक्त धूल कभी नहीं मिटती।
जैसे ही केन्या के नागरिक इस ‘पर्यावरणीय नरसंहार’ को न्याय दिलाने के लिए आगे बढ़ते हैं, भारत समेत कई विकासशील राष्ट्रों को यह सवाल उठाना चाहिए कि क्या उनके पास पर्याप्त नियामक ढाँचा है, और क्या वे इस प्रकार के ‘विकास’ के दमन के लिए तैयार हैं।
Published: May 8, 2026