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कांग्रेस का तमिलनाडु में नया कदम: वी.टी.के को समर्थन, डीएमके ने कहा ‘धोखा’
जैसे ही भारत में चुनाव‑परिणामों की एक्सट्राओर्डिनरी लहरें चल रही हैं, संघीय प्रमुख कांग्रेस ने 6 मई 2026 को तमिलनाडु के छोटे‑से‑राजनीतिक खिलाड़ी वी.टी.के (विक्रम तिवारी कर्नातक) का खुला समर्थन किया। यह कदम उसी दिन आया जब वह अपने पूर्व गठबंधन डेमोक्रेटिक पार्टी (DMK) से कट गया, जो इस क्षेत्र में कई वर्षों से सतत गठजोड़ का द्योतक रहा है।
विरोधी दल के इस कदम को तुरंत ही DMK के वरिष्ठ नेता के द्वारा ‘बैकस्टैब’ की सख़्त शब्दावली में वर्णित किया गया। उन्होंने कहा, “कांग्रेस ने अपने सिद्धान्तों को छोड़ कर सत्ता‑सुरक्षा के लिए इस तरह के निचले‑स्तर के गठबंधन को चुना, यह हमारे भरोसे का बुनियादी उल्लंघन है।” पार्टी के भीतर इस निर्णय पर तीखी बहस जारी है, कुछ चुनाव‑संकल्पों को ‘राजनीतिक जिम्बिशी’ मानते हुए, अन्य इसे ‘संभवित क्षेत्रीय विकास’ के रूप में देख रहे हैं।
साथ ही, वेस्ट बंगाल में पोस्ट‑पोल हिंसा की लकीरें तेज़ी से फैल रही हैं। मतगणना के परिणाम के बाद बढ़ती बहस‑और‑गुस्से के बीच कई जिलों में ध्वंस, जलपम्प, और असहाय नागरिकों के खिलाफ झड़पें दर्ज हुईं। राज्य सरकार की त्वरित प्रतिक्रिया पर सवाल उठाते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि अगर कानून‑व्यवस्था नहीं सुधरी तो अगले साल संसद में इस राज्य की भूमिका पर गंभीर समीक्षाएँ होंगी।
इन घरेलू उथल‑पुथल के अलावा, भारतीय कूटनीति आज दो बहुराष्ट्रीय तनावों के बीच फँसी हुई है: ईरान‑अमेरिका के बीच बरसों से चल रहे सैन्य‑डिप्लोमैटिक टकराव ने मध्य‑पूर्व में ऊर्जा सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है। इस संदर्भ में, भारत को अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को बनाए रखते हुए, दोनों पक्षों के साथ संतुलन स्थापित करना पड़ेगा—क्योंकि तेल की कीमतें बढ़ना भारतीय महंगाई को उलझा सकता है, जबकि यू.एस. के साथ रक्षा‑सहयोग को बनाए रखना सुरक्षा परिदृश्य को स्थिर रखता है।
इन सभी घटनाओं को एक ही छत के नीचे देखना भारतीय नीति निर्माताओं के लिए चुनौतीपूर्ण सिद्ध हो रहा है। कांग्रेस का तमिलनाडु में ‘बैकस्टैब’ कदम दिखाता है कि राष्ट्रीय विपक्षी दल सत्ता‑केन्द्र के निकट पहुँचने के लिये कभी‑कभी पुरानी दोस्ती को फेंक देता है। वहीं, DMK का कड़ा रुख संकेत देता है कि क्षेत्रीय पहचान को बल में बदलना अब आसान नहीं रहा। वेस्ट बंगाल की हिंसा, अगर रुकी नहीं तो देश के लोकतांत्रिक मूल्यों पर सवाल उठेगा, और ईरान‑अमेरिका का तनाव भारत के ‘गैर‑पक्षपात’ की पाख़ंडी नीति को फिर से उजागर करेगा।
परिणामस्वरूप, भारतीय राजनेता अब न केवल अपना वोट‑बैंक बल्कि राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी वैधता को भी पुनः परिभाषित करने की कोशिश में हैं। यह समय है कि जनता वही देखे जो शब्दों के पीछे छिपी वास्तविकताएँ हैं—ज्यादा वादे नहीं, बल्कि ठोस कार्य।
Published: May 7, 2026