ओलेश्की के नागरिकों को महीनों से भोजन‑दवा की कमी, रुख़-ए‑मौत का ख़तरा
यूक्रेन के दक्षिण‑पूर्वी शहर ओलेश्की में अब तक की सबसे बड़ी मानवीय संकट छुपा है। फरवरी 2022 में रूसी सेना के कब्जे के बाद से यह शहरी केन्द्र दो साल से अधिक समय तक सक्रिय युद्ध‑रेखा पर फंस रहा है। नई रिपोर्टें बताती हैं कि यहाँ के नागरिकों को ताज़ी भोजन, साफ़ पानी और बुनियादी दवाइयों की आपूर्ति कई महीनों से नहीं मिल पाई है।
संदर्भ में देखी जाए तो इस स्थिति के पीछे कई स्तरों पर असफलताएँ छिपी हैं। पश्चिमी सहयोगियों ने यूरोपीय संघ और यूएसए के माध्यम से मानवीय सहायता पैकेजों की घोषणा की, पर रूसी कण्ट्रोल वाले सीमा‑पैठ के कारण उनका अधिकांश हिस्सा शहर तक पहुँचा नहीं। यूक्रेनी सेना ने कई बार पास के क्षेत्र से राहत सामग्री का मार्ग खोलने का प्रयास किया, पर रूसी टोही‑दिव्ये उनका विरोध कर रहे हैं, जबकि अंतर्राष्ट्रीय मानवीय संगठन खुद को “भूखी जमीन” का सामना करते हुए पाते हैं।
इसका परिणाम यह है कि ओलेश्की के हजारों परिवार अब संतान को दूध, बुजुर्ग को दवा, और स्वयं को रोज़मर्रा की बुनियादी ज़रूरतों के लिए अनिच्छा से जूझ रहे हैं। स्थानीय स्वास्थ्य कार्यालयों ने कहा कि टाइफाइड, डेंगर जैसी रोगों के प्रकोप की संभावना बढ़ रही है, जबकि श्वास‑रोक उपचार के लिए आवश्यक एंटीबायोटिक भी उपलब्ध नहीं हैं।
वैश्विक स्तर पर, इस संकट ने अंतर्राष्ट्रीय शक्ति‑संरचनाओं के दोहरी मानदंडों को उजागर किया। जबकि पश्चिमी राष्ट्रों ने रूसी युद्ध‑संकल्पों को कड़ी नीतियों से दबाने की घोषणा की, वही संकल्प अक्सर मानवीय सहायता को “राजनीतिक उपकरण” बना देता है। इस दोहरे मानदंड का फायदा उठाते हुए, रूसी दूतावास ने कई बार दुनिया को यह बताने की कोशिश की कि “सिविलियन सिविलिएशन को ख़तरे में डालना केवल यूक्रेनी पक्ष का इरादा है”।
भारत के लिए यह संघर्ष दोहरे जाल की तरह है। दिल्ली ने सन्देश दिया है कि वह “मानवता के आधार पर” मानवीय मदद का समर्थन करता है, पर साथ ही रूस के साथ रणनीतिक आर्थिक संबंध बनाए रखने की अपनी नीति नहीं बदल रही है। भारतीय मीडिया ने भी इस मुद्दे को कभी‑कभी ‘दूर के संघर्ष’ के रूप में प्रस्तुत किया है, जिससे अक्सर ओलेश्की के लोगों की वास्तविक पीड़ा अनदेखी रह जाती है। भारतीय कंपनियों के कर्मचारी, जो रूसी ऊर्जा परियोजनाओं में काम कर रहे हैं, उन पर भी सीमा‑पार प्रतिबंधों के बदले में आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
यदि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय अपने सार्वजनिक बयान और वास्तविक कार्यों के बीच का अंतर नहीं घटा पाता, तो ओलेश्की के नागरिकों को “रोड ऑफ़ डेथ” से बचने का एक ही उपाय बचता है: खुद‑से बुनियादी सामुदायिक नेटवर्क स्थापित करना। पर यह भी सवाल बनता है कि क्या कोई भी महाशक्ति इतनी उदासीनता को सहन करेगी, जब तक वह अपने राष्ट्रीय हितों की परत में परिलक्षित हो? इस सवाल का उत्तर शायद अभी तक नहीं मिला है, पर कम से कम ओलेश्की की गलियों में गूंजती हुई आवाज़ें यह सूचित करती हैं कि मानवीय संकट को शब्दों में नहीं, बल्कि त्वरित कार्रवाई में बदलना ही एकमात्र उपाय होगा।
Published: May 6, 2026