ऑस्ट्रेलिया में मानविकी छात्रों को 25 वर्ष से अधिक लगेंगे छात्र ऋण चुकाने में, जॉब रेडी ग्रेजुएट्स नीति पर सवाल
ऑस्ट्रेलियाई वित्त मंत्रालय के नवीनतम मॉडलिंग के अनुसार, मानविकी शाखा के एक-चौथाई छात्र को अपना छात्र ऋण पूरी तरह चुकाने में 25 साल से अधिक का समय लगेगा। यह आकड़ा उसी सरकार के 2021 में शुरू किए गए ‘जॉब रेडी ग्रेजुएट्स’ (JRG) कार्यक्रम की मौजूदा संरचना से उत्पन्न होता है, जिसने व्यावसायिक और तकनीकी पढ़ाई को प्राथमिकता दी, जबकि मानविकी एवं रचनात्मक कला को ब्याज‑दर वाले कर्ज की चट्टान पर धकेल दिया।
जॉब रेडी ग्रेजुएट्स पहल, स्कॉट मॉरिसन के कार्यकाल में लागू, का उद्देश्य स्नातक को तुरंत रोजगार योग्य बनाना था। वास्तविकता में, यह नीति ‘भर्ती‑के‑लिए‑कोर्स’ को बढ़ावा देती है, जबकि मानविकी छात्रों को सैकड़ों हजारों डॉलर का ऋण भार दे देती है। वित्तीय मॉडल बताता है कि दो‑तिहाई से अधिक मानविकी और रचनात्मक कला के स्नातक $50,000 से अधिक ऋण लेकर स्नातक होते हैं – एक ऐसी रकम जो ज्यादातर घरों के वार्षिक आय से भी अधिक है।
वैश्विक स्तर पर देखी जाने वाली शिक्षा‑वित्तीय नीति की इस प्रवृत्ति का विरोधाभास स्पष्ट है। जबकि कई विकसित अर्थव्यवस्थाएँ तकनीकी एवं वैज्ञानिक शिक्षा को समर्थन देती हैं, मानविकी को अक्सर ‘अत्यावश्यक नहीं’ का लेबल मिल जाता है। परिणामस्वरूप, एक वर्गीय विभाजन बनता है: तकनीकी स्नातक को सरकारी ग्रांट और तेज़ रोजगार मिलते हैं, जबकि साहित्य‑समीक्षक को केवल कर्ज‑भारी पीढ़ी का बोझ मिलता है। यह अंतर न केवल सामाजिक विषमता को बढ़ाता है, बल्कि दीर्घकालिक नवाचार क्षमता को भी कमजोर करता है – क्योंकि साहित्य, इतिहास और कला के बिना कई सामाजिक समस्याओं का समाधान अधूरा रहता है।
भारत में भी छात्र ऋण का बोझ बढ़ रहा है, परन्तु यहाँ की नीति‑परिदृश्य कुछ अलग है। भारतीय सरकार ने अपेक्षाकृत कम ब्याज दरों पर शिक्षा ऋण की सुविधा दी है, साथ ही रचनात्मक और मानविकी क्षेत्रों को विभिन्न स्कॉलरशिप और फ्रीलांस समर्थन योजनाओं से सुदृढ़ किया गया है। फिर भी, अगर ऑस्ट्रेलिया जैसी ‘जॉब‑केन्द्रित’ शिक्षा नीति को अपनाया गया, तो भारतीय मानविकी स्नातक भी खुद को ‘ब्याज‑बाजार’ की नयी सड़कों पर पाते। इस परिप्रेक्ष्य में ऑस्ट्रेलिया का उदाहरण सावधानीपूर्वक अध्ययन योग्य है।
नीति‑निर्माताओं की बेहतर समझ की आवश्यकता स्पष्ट है: एक व्यापक शिक्षा प्रणाली को विविध ज्ञान क्षेत्रों को समान मूल्य देना चाहिए, न कि केवल रोजगार‑सुरक्षा को मापदंड बनाना चाहिए। ‘जॉब रेडी’ शब्द वास्तव में ‘जॉब‑लेबिलिटी‑ड्रिल’ बन कर रह गया है, जहाँ ‘लेबिलिटी’ छात्र ऋण का वह बोझ है, जिसे कभी‑कभी ही छात्र खुद वहन कर पाएँ। चाहे वह 25 वर्ष का ऋण चक्र हो या $50,000 से अधिक का कर्ज, इस नीति के प्रभाव को मात्र आंकड़ों में नहीं, बल्कि सामाजिक स्वास्थ्य और भविष्य के बौद्धिक पूँजी में देखना चाहिए।
अंततः, ऑस्ट्रेलिया का यह आंकड़ा केवल एक राष्ट्रीय समस्या नहीं, बल्कि वैश्विक शिक्षा‑नीति के असंतुलन की चेतावनी है। अगर नीति‑निर्माता ‘रोजगार‑पहले’ के श्लोक को दोहराते रहेंगे, तो मानविकी के छात्र न केवल काव्य नहीं लिख पाएँगे, बल्कि कर्ज‑ब्याज की लय में अपने भविष्य की ध्वनि भी खो देंगे।
Published: May 4, 2026