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ऑस्ट्रेलिया में पाँच साल की वर्लपिरी बच्ची की मौत पर शोकसभा, राजनीतिकरण से बचने का आह्वान
अलीस स्प्रिंग्स, उत्तरी प्रदेश में पिछले हफ़्ते मृत पाए गए पाँच साल की वर्लपिरी लड़की कुमंजयी लिटिल बेबी की मौत पर राष्ट्रीय स्तर पर शोक और प्रतिरोध का मिश्रण देखी गई। राष्ट्रीय प्रथम राष्ट्र बच्चों की प्रतिनिधि संस्था ने इस दुर्दशा को किसी भी राजनीतिक उपयोग से बचने का निर्देश दिया, जबकि देश भर में सैकड़ों लोग गुमनाम शोकसभाओं में भाग लेकर परिवार के साथ मौन एकता दर्शा रहे हैं।
कुंझायी की लाश पाँच दिनों की खोज‑मिशन के बाद एक डेज़र्टेड इलाके में मिली, जहाँ पुलिस का प्रारंभिक अनुमान है कि उसे हत्या किया गया। आधिकारिक जांच अभी शुरू हुई है, लेकिन पहले से ही विभिन्न राजनैतिक दल और सामाजिक मीडिया पर आगे‑पीछे का ख़र्चा शुरू हो चुका है – ऐसे में परिवार के मन पर एक और बोझ जुड़ता जा रहा है।
यह घटना ऑस्ट्रेलिया में लंबे समय से चल रही मूल निवासी जनसंख्या के प्रति सरकारी उदासीनता, स्वास्थ्य‑सुरक्षा के अंतर, और न्यायिक प्रणाली की धीमी प्रतिक्रिया को फिर से उजागर कर रही है। बहु‑सांस्कृतिक नीति का दावा करने वाले एक देश में, ऐसे मामलों को ‘राजनीतिक साधन’ बनाने की प्रवृत्ति निराशाजनक रूप से आम दिखती है। इस पर टिप्पणी करते हुए एक वरिष्ठ सामाजिक वैज्ञानिक ने कहा, “जब सरकार अपने मनमाने ‘एजेंडा’ को बेजान शरारती पीड़ितों की कहानियों पर थोपती है, तो वह बुनियादी मानवता से दूर हो जाती है।”
भारत के कई आदिवासी क्षेत्रों में भी बच्चों की मौत की आँकड़े इसी तरह के ‘गुज़रते‑राते’ में खोए हुए हैं। अल्पसंख्यक अधिकारों के लिए भारत‑ऑस्ट्रेलिया वार्ता के दौरान दोनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र के मूल निवासी अधिकारों के घोषणापत्र का सम्मान करने की घोषणा की थी, पर जमीन पर यह वादे अभी तक किसी ठोस नीति में बदले नहीं हैं। हमारे यहाँ भी ‘राजनीतिकरण’ शब्द का प्रयोग अक्सर सरकारी पद्मपट पर मनमुनाने निर्णयों को छुपाने के लिये किया जाता है।
वर्तमान में शोकसभा केवल कुमंजयी के परिवार के लिए नहीं, बल्कि पूरे मूल निवासी समुदाय के लिए एक मौन प्रतिरोध बन गई है। सिडनी, मेलबोर्न, पर्थ और दूरस्थ इलाके में आयोजित शोक सभा में प्रतिभागियों ने एकत्रित होकर न सिर्फ दुःख व्यक्त किया, बल्कि ‘पॉलिसी‑जैबेड’ बयानबाज़ी के खिलाफ भी विरोध किया। कई प्रर्दशन में स्थानिय कलाकारों ने प्रतिकात्मक रूप से ‘बारबिक्यूस’ (एक प्रकार की सार्वजनिक सभा) का चित्रण किया, जो दर्शाता है कि समुदाय अभी भी अपनी आवाज़ सुनाने की कोशिश कर रहा है – चाहे वह मीडिया के निशान पर, राजनैतिक मंचों पर या अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के दस्तावेज़ों में हो।
पर्यवेक्षक यह भी नोट करते हैं कि इस तरह की राष्ट्रीय-level शोकसभा अक्सर नीति‑निर्णय पर अल्पकालिक दबाव डालती है, पर वास्तविक परिवर्तन के लिये ‘स्थाई बजट’ और ‘सही कानूनी ढांचा’ की आवश्यकता होती है। आयरनिक रूप से, जब सरकारें ‘कमज़ोर’ बच्चे की रक्षा के लिए तरकीबें निकालती हैं, तो वही क्षण उनके अस्तित्व में मौजूद प्रणालीगत असमानता को उजागर करता है।
इस दुखद घटना के बाद, अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों ने ऑस्ट्रेलिया सरकार को ‘इंडिजेनस अधिकारों के अद्यतन कार्यसूची’ तैयार करने की माँग की है, साथ ही तुरंत एक स्वतंत्र जांच आयोग स्थापित करने को कहा है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने भी इस पर टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘हर देश में मूल निवासी बच्चों की सुरक्षा एक सार्वभौमिक जिम्मेदारी है, और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग इस दिशा में मजबूती लाने में सहायक हो सकता है।’
यदि इस शोक को केवल ‘राजनीतिक मदद का अवसर’ कहा जाये तो यह उन परिवारों की पीड़ा को अनदेखा कर दिया जायेगा, जो अब भी निहित त्रासदी के साक्षी हैं। तो अब सवाल यह नहीं कि कुमंजयी की मृत्यु को कैसे उपयोग किया जाए, बल्कि यह है कि यह किस हद तक हमारे मौजूदा सामाजिक‑राजनीतिक ढाँचे को बदलने के लिये प्रेरित कर सके।
Published: May 7, 2026