ऑस्ट्रेलिया‑फ़िजी सुरक्षा‑आर्थिक समझौते का निकट‑अंत, जबकि चीन के प्रतिरोध ने वानूआतु में साझेदारी को धुंधला किया
ऑस्ट्रेलिया के विदेश मंत्री पेननी वोंग ने इस सप्ताह फ़िजी की यात्रा करके दो साल से चल रहे सुरक्षा‑आर्थिक समझौते को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया तेज की। यह समझौता अल्बानेज़ सरकार की व्यापक रणनीति का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य प्रशांत के छोटे द्वीप राष्ट्रों में चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करना है। फ़िजी के साथ संभावित समझौते को अक्सर “ऐतिहासिक” कहा जाता है, पर असली बात यह है कि ऑस्ट्रेलिया ने अपने रक्षा‑सहायता के बजट को सैटेलाइट‑इंफ्रास्ट्रक्चर, समुद्री निगरानी और व्यापारिक कनेक्टिविटी तक सीमित करके, सैद्धांतिक फ्यूचर‑प्रोजेक्ट को वास्तविक खर्च‑सीमा में धकेल दिया है।
इसी बीच, वानूआतु में ऑस्ट्रेलिया‑प्राथमिक सुरक्षा साझेदारी को लेकर चीन की कड़ी चोट ने लाल संकेत दिखा दिया। प्रारंभ में दोनों पक्ष एक व्यापक सुरक्षा गठबंधन की ओर बढ़ रहे थे, जिसमें ऑस्ट्रेलिया को वानूआतु की मुख्य सैन्य सहयोगी बनाना तय था। लेकिन बीजिंग ने कूटनीतिक दबाव और आर्थिक प्रतिस्पर्धा के साथ इस योजना को धूमिल कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप वाणिज्यिक‑सुरक्षा समझौते की सीमा घटाकर केवल बुनियादी क्षमताओं तक सीमित कर दी गई। यह संकेत देता है कि किसी भी पार-प्रशांत गठबंधन को चीन की “रोकथाम” रणनीति के बिना टिकाना मुश्किल है।
प्रभाव की बात करें तो दोनों विकासशील राष्ट्रों में ऑस्ट्रेलिया का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए दोधारी तलवार बन सकता है। न्यू‑डिलेड के कई रणनीतिक समूहों ने कहा है कि भारत को क्वाड‑दृष्टिकोण को मजबूती से पेश करना चाहिए, ताकि ऑस्ट्रेलिया‑चीन‑वानूआतु के त्रिकोणीय शक्ति संतुलन में भारत को बायस न मिले। भारत की फ़िजी में बड़ी डायस्पोरा, और द्वीप-हिंद महासागर में बढ़ती समुद्री काबिलियत, दोनों ही संभावित सहयोग के बिंदु हैं—यदि भारत अपनी नीतियों में धीरज और स्पष्ट प्राथमिकता दिखा पाए।
संस्थागत स्तर पर, ऑस्ट्रेलिया की इस रणनीति में शासन‑परिषद के आंतरिक अराजकता को नहीं देखा जा रहा है। राउंड‑टेबल बहस में अक्सर “सुरक्षा‑संरक्षण” शब्दों को वाक्य‑भरी हुई “व्यापार‑कनेक्टिविटी” से बदल दिया जाता है, जिससे वास्तविक पारदर्शिता के बजाय जटिल काग़ज़ी काम ही रहता है। इस धुंधली भाषा ने न केवल स्थानीय जनसंख्या में भय उत्पन्न किया है, बल्कि शेष अंतर्राष्ट्रीय साझेदारों में अनिश्चितता भी बढ़ाई है—एक सच्चा “डिप्लोमैटिक फायर‑सेल” जहाँ शब्द कागज़ पर शाही, पर जमीन पर बिखरे हुए।
निष्कर्षतः, फ़िजी के साथ समझौते की अंतिम रेखा पर पहुँचना ऑस्ट्रेलिया की जलवायु‑सुरक्षा नीति में एक प्राथमिक जीत हो सकता है, पर वानूआतु की समझौते में चीन की जड़ें दर्शाती हैं कि सिंगल‑पॉलिसी‑इम्प्लीमेंट का समय समाप्त हो गया है। इस क्षितिज पर जहाँ भारत भी अपनी “इंडो‑पैसिफिक” आकांक्षाओं को पुनः भरेगा, वहाँ द्विपक्षीय एवं बहुपक्षीय औपचारिकताओं को ठोस परिणामों में परिवर्तित करना ही असली परख होगा।
Published: May 5, 2026