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ऑस्ट्रेलिया की लेबर सरकार ने ईवी टैक्स छूट एक साल और बढ़ाई, लागत बढ़ने की मार

सिडनी – ऑस्ट्रेलियाई लेबर सरकार ने मौजूदा इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) कर छूट को अगले वित्तीय वर्ष तक पूरी तरह बरकरार रखने का फैसला किया है। यह कदम उन उपभोक्ताओं के बीच तेज़ी से बढ़ती मांग के बीच आया है, जो इरान‑युद्ध के कारण आसमान छू रही ईंधन कीमतों से बचने के लिये विकल्प ढूँढ रहे थे।

भविष्य के बजट में, सरकार ने घोषणा की है कि इस सुविधा को धीरे‑धीरे सघन किया जाएगा। अगले तीन वर्षों में छूट का दायरा घटते हुए केवल $75,000 के नीचे मूल्य वाले ईवी तक सीमित कर दिया जाएगा। इस ‘सेंसिबल बदलाव’ का उद्देश्य एक बढ़ते हुए वित्तीय बोझ को नियंत्रण में लाना है – वर्तमान में कार्यक्रम की लागत अनुमान से कहीं अधिक बढ़ गई है।

सरकार का यह कठोर‑संकल्प कार्य नीति‑इंजीनियर्स को आसान नहीं लग रहा – साल भर के बाद भी ‘छूट को पूरी तरह बरकरार’ रखने की घोषणा, फिर भी तीन साल में इसे आधा‑आधा कसना, एक तरह का ‘पाते‑पाते ही टॉप-अप’ जैसा प्रतीत होता है। ऐसे ‘सेंसर’ नीति‑कदम अक्सर चुनावी समय में जनता के इंधन‑बिल को रेफ्रिजरेटर की तरह ठंडा रखने के लिये उपयोग होते हैं, जबकि वास्तविक बजट में छेद-छूट की जाँच‑परख उधार के रूप में छुपी रहती है।

वैश्विक संदर्भ में, ईंधन की कीमतों का छलांग इरान‑युद्ध के कारण नहीं, बल्कि मध्य‑पूर्व में तेल आपूर्ति की अनिश्चितता और मौसमी मांग में बदलाव के कारण है। यह प्रतिबिंब भारत जैसे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को भी मिलता है, जहाँ पेट्रोल‑डिज़ेल के मूल्य लगातार उपभोक्ता कई बार खरीद शक्ति को मात दे रहे हैं। भारत की सरकार इस पर अपने ईवी प्रोत्साहन पैकेज को पुनः‑देखने में लगी है, जबकि ऑस्ट्रेलिया में यह नीति जल्द ही ‘वित्तीय स्थिरता’ के नाम पर धीरे‑धीरे धुंधली होते देखी जा रही है।

संस्थागत आलोचना के पैरावर्त में, यह कहा जा सकता है कि ऑस्ट्रेलिया के राजकोषीय नियोजकों ने शुरू में योजना की लागत‑आधारिता का अभाव दिखाया। ‘सेंसिबल बदलाव’ शब्दावली सुनने में तो मधुर लगती है, पर इसका ठोस अभिप्राय है – टैक्स रियायत के लिए ’विपरीत‑परिणाम’ के रूप में सीमित बजट आवंटन। यह भी दिखाता है कि राजनीतिक गलियारे में ‘पैसों की औरेंगी’ कितनी जल्दी ‘लोड‑शेडिंग’ में बदल जाती है, जब सार्वजनिक भलाई का सवाल आता है।

फ़्लोर पर इस नीति के परिणाम स्पष्ट दिखाई देंगे: अभी के लिए ईवी की बिक्री में तात्कालिक उछाल, पर आगे चलकर महंगे मॉडलों का दलाल आंकड़े घटेंगे। उपभोक्ताओं को अब दो‑तीन साल में ‘किफ़ायती’ विकल्प ढूँढ़ने पड़ेंगे, या फिर उनका रिफ़ंड कटौती का सामना करना पड़ेगा। इस मोड़ पर, ऑस्ट्रेलिया को भारत के समान, स्थायी ईवी सुविधा के लिये व्यापक बुनियादी ढाँचा और सस्ते बैटरी तकनीक पर भी ध्यान देना आवश्यक होगा, न कि केवल टैक्‍स‑चिट‑चैट पर।

Published: May 4, 2026