ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने गैस निर्यात कर को टाला, पर बढ़ता दबाव अंत नहीं देगा
कैनबरा में बरसात के साथ, सिडनी के ग्लीडस्टोन में धूप रही—दोनों ही घटनाओं ने स्पष्ट कर दिया कि अगले बजट में ऑस्ट्रेलिया का नया गैस निर्यात कर केवल विचार‑धारा में ही रहेगा। एनी थॉम्पसन के बायुलेटिन के अनुसार, प्रधानमंत्री एंथनी अल्बेनिज़ ने जापान की प्रधानमंत्री सने ताइची को वार्षिक नेताओं की बातचीत में बुलाया, जो 50 साल पुरानी द्विपक्षीय संधि के वार्षिक समारोह का हिस्सा था। यह कूटनीतिक मुलाकात, जिसमें LNG की भविष्य‑सुरक्षा और एशिया‑पैसिफिक ऊर्जा बाजार की मौजूदा आपूर्ति‑संकट पर चर्चा हुई, ने दर्शाया कि ऑस्ट्रेलिया अभी भी एशियन ऊर्जा साझेदारों की नाराजगी से बचना चाहता है।
एक ओर, ग्लीडस्टोन के समुद्री टर्मिनलों में, जहाँ देश की सबसे बड़ी LNG निर्यात सुविधा स्थित है, निर्यातकों ने लगातार कहा कि कर लगना ‘सपनों को तोड़ने वाला’ होगा। दूसरी ओर, ऑस्ट्रेलियाई संसद में कई राजकोषीय समिति और ग्रीन-लेफ़्ट गठबंधन के सांसद, वैकल्पिक ऊर्जा निधियों और जलवायु आश्वासनों के लिए इस कर को ‘आवश्यक’ कह रहे हैं। यह दोहरी धारा, जहाँ विदेश नीति ‘कूटनीति के कपड़े में’ कर नहीं लगाकर बचते हैं, वहीं घरेलू राजस्व की कसौटी पर ‘बजट में छेद’ की उम्मीद कर रही है, स्पष्ट करती है कि नीति‑बयानों और वास्तविक परिणामों के बीच एक खाई है।
एशिया‑पैसिफिक में, जहाँ भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और दक्षिण‑पूर्व एशिया की अर्थव्यवस्थाएँ तेज़ी से LNG पर निर्भर हो रही हैं, ऑस्ट्रेलिया का अभी‑तक निर्यात कर न लगाना एक ‘समय‑बचत’ की तरह दिखता है। भारत, जो इस साल अपनी गैस मांग में 20% की वृद्धि का अनुमान लगा रहा है, ऑस्ट्रेलिया से अतिरिक्त LNG आयात करके अपनी जलविद्युत‑हल्की‑गैस मिश्रण को संतुलित करना चाहता है। यदि ऑस्ट्रेलिया अचानक कर लगा देता है, तो भारतीय आयातकों को लागत‑बढ़ोतरी का सामना करना पड़ेगा, जिससे मौजूदा ऊर्जा‑संकट में नया मोड़ आ सकता है।
वास्तविकता यह है कि अल्बेनिज़ की सरकार का तत्काल उद्देश्य ‘जापान‑ऑस्ट्रेलिया के दशकों पुराने मित्रता के संगम’ को एक सुगम कूटनीतिक मंच बनाना है। लेकिन वैश्विक स्तर पर ऊर्जा सुरक्षा को लेकर तनाव, विशेषकर रूसी गैस की कमी और जलवायु लक्ष्य की रफ्तार के कारण, घरेलू राजकोष को भी ‘नयी आय के स्रोत’ की तलाश है। अल्बेनिज़ के “कॉलोनी‑जैसे” विद्यमान संरचनाओं पर भरोसा अब ध्वनि नहीं लग रहा; देश को अपने ‘संसाधन‑राजस्व’ को दोबारा सोचने की ज़रूरत है।
पत्रकारों की चुटीली टिप्पणी यह है कि सरकार ने बजट में कर नहीं जोड़कर ‘टैक्स‑बचाव’ का मंच तैयार कर लिया, पर ‘अभी‑के लिये नहीं’ के शब्दावली में पृथ्वी के सबसे बड़े ‘गैस‑समुद्र’ को ‘क्लिलॉ-टैक्स’ से बचाने की कोशिश की। इस पहलकदमी की दीर्घकालिक निरंतरता पर सवाल उठता है: असली मुद्दा कर नहीं, बल्कि उन राजनीतिज्ञों की ‘टैक्स‑रिक्लेम’ करने की क्षमता है जो वार्षिक ‘ऊर्जा-समझौते’ की कागज़ी पक्ति में बंधे हैं।
संक्षेप में, अल्बेनिज़ ने अगले सप्ताह के बजट में गैस निर्यात कर को टाला, पर यह केवल अस्थायी राहत है। एशिया‑पैसिफिक के ऊर्जा बाजार की तख्तापलट, घरेलू राजस्व की कमी और पर्यावरणीय दबाव—इन सभी का संगम सरकार को किसी न किसी मोड़ पर “कर” की राह पर मजबूर कर सकता है। तब तक, ऑस्ट्रेलिया के शासकों को ‘कुर्सी के नीचे के बटुए’ की धड़कन सुनते रहना पड़ेगा, चाहे वह सनी ग्लेडस्टोन हो या बरसाती कैनबरा।
Published: May 5, 2026