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Category: दुनिया

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ऑस्ट्रेलिया की एंटीसेमिटिज्म आयोग में उजागर: यहूदियों के खिलाफ 'फैशन' बनता घृणा

ऑस्ट्रेलिया में एंटीसेमिटिज्म पर गठित महाराज्य आयोग ने अपने चौथे सार्वजनिक सुनवाई के दिन एक नया, कड़वा सच सामने लाया: 7 अक्टूबर 2023 के इज़राइल‑हामास संघर्ष के बाद यहूदी‑ऑस्ट्रेलियावासियों को ‘कम यहूदी‑जैसे’ नाम अपनाने, नौकरी से इस्तीफ़ा देने और सहकर्मियों से मौखिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा है। आयोग के प्रतिदिन के सत्र अब केवल आँकड़े नहीं, बल्कि उन व्यक्तिगत कहानियों का अभिलेख बन रहे हैं, जो इस बात को दिखाते हैं कि घृणा अब एक अंधाधुंध झंकार नहीं, बल्कि कुछ हद तक ‘फ़ैशन’ बन गई है।

सत्र में विशेष एंटीसेमिटिज्म दूत ने कहा कि यहूदियों के खिलाफ नफ़रत "लगभग फैशन बन गई है" — एक ऐसा बयान जो नीति‑निर्माताओं की तुच्छता को स्पष्ट रूप से उजागर करता है। प्रतिवादियों ने उत्तर दिया कि सरकार ने 2024 में ही एंटीसेमिटिज्म विरोधी अधिनियम पारित किया, परन्तु वास्तविक कार्यान्वयन अभी भी अंकुश में है। 2025 में जारी राष्ट्रीय प्रतिबंधात्मक योजना में भी यहूदियों की सुरक्षा के लिए विशेष प्रावधानों को ‘प्रायोगिक’ कहा गया, जबकि असल में कई अस्पतालों और शैक्षणिक संस्थानों में यहूदियों को नाम बदलने की सलाह दी गई।

न्यू साउथ वेल्स हेल्थ की एक नर्स ने खुलकर कहा कि उनका स्वास्थ्य प्रणाली "यहूदियों के लिए सुरक्षित नहीं" है। यह सिर्फ एक कर्मचारी की शिकायत नहीं, बल्कि एक संस्थागत असफलता का संकेत है, जिसमें विविधता‑विरोधी नीतियों की सख्त निगरानी की कमी साफ़ झलकती है। इस प्रकार की लापरवाही न केवल ऑस्ट्रेलिया के अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार रैंकिंग को नीचे ले जाती है, बल्कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए भी जोखिम पैदा करती है, जो अपनी कार्यशक्ति में भारतीय, अफ्रीकी और अन्य अल्पसंख्यकों को शामिल करती हैं।

विगत वर्ष में यूरोप, संयुक्त राज्य अमेरिका और मध्य पूर्व में एंटीसेमिटिज्म के आँकड़े शिखर पर पहुँच गये थे; ऑस्ट्रेलिया इस प्रवृत्ति से बाहर नहीं रहा। लेकिन जबकि विदेश में बार‑बार यहूदियों के विरुद्ध हमले होते हैं, यहाँ तक कि रिपोर्टेड घटनाओं की संख्या आधी घटी हुई है, फिर भी उन घटनाओं की तीव्रता और सामाजिक प्रभाव अधिक है। यह नज़रअंदाज़ी का सिलसिला उस पारदर्शी कानूनी ढाँचे को उजागर करता है, जो अक्सर “सॅटिस्फैक्टरी” शब्द से ही संतोष मान लेता है।

भारत‑ऑस्ट्रेलिया संबंधों को देखते हुए, यह मुद्दा भारतीय दर्शकों के लिए भी प्रासंगिक है। ऑस्ट्रेलिया में लगभग चार सौ हजार भारतीय मूल के लोग रहते हैं, जिनमें कई सूक्ष्म सामाजिक नेटवर्क में यहूदी सहयोगी संस्थाओं के साथ काम करते हैं। भारत का स्वयं का एंटीसेमिटिज्म विरोधी इतिहास और बहुसांस्कृतिक संवेदना, ऑस्ट्रेलियाई नीति‑निर्माताओं की लापरवाही को एक ठंडा चेतावनी संकेत बनाता है। इस बात को याद रखना चाहिए कि भारत‑ऑस्ट्रेलिया रणनीतिक साझेदारी की परतें—कुशल कार्यबल, शिक्षा‑विनिमय और रक्षा सहयोग—इन सामाजिक दुविधाओं के समाधान में योगदान दे सकती हैं, अगर दोनों पक्ष इस विषय को वैधानिक एवं सामाजिक स्तर पर गंभीरता से लेते हैं।

आलोचना तकलीफ़ नहीं, बल्कि आवश्यक है। आयोग का प्रमुख ध्येय केवल कागज पर कमीशन बनाना नहीं, बल्कि “फ़ैशन” शब्द को ‘दोषी’ में बदलना है। अन्यथा, अगली रिपोर्ट में वही शब्द निहित रहेगा, बस एक नया “फैशन”—शायद जलवायु‑परिवर्तन के विरोधी—को दिखाते हुए।

Published: May 7, 2026