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Category: दुनिया

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एशिया में गर्मी के मार्जिन पर एयर‑कंडीशनिंग की कमी, इरान के युद्ध से ऊर्जा संकट

जैसे ही दक्षिण एवं दक्षिण‑पूर्व एशिया के शहरों में थर्मामीटर एक‑एक करके 40 डिग्री पर पहुँचे, सर्दियों के हमराज़ी को याद दिलाने वाला एक नया संकट उभरा: एयर‑कंडीशनिंग की अल्पता। यह सिर्फ एक मौसमी असुविधा नहीं, बल्कि इरान में अचानक शुरू हुए संघर्ष की जड़ पर निहित एक जटिल ऊर्जा‑संकट का प्रत्यक्ष परिणाम है।

जुलाई‑2025 में इरान के पूर्व में गठित गठबंधन के साथ जमीनी युद्ध शुरू हुआ, जिससे तेल तथा प्राकृतिक गैस के निर्यात पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिबंध और एशिया‑पीसी उर्जा बाजार में अचानक हड़बड़ी की लहर आई। इरान विश्व के प्रमुख गैस निर्यातकों में से एक है; विशेषकर भारत, सउदी अरब और चीन के साथ दीर्घकालिक अनुबंध मौजूद थे। युद्ध से बाधित निर्यात और ओपेक की आपूर्ति में अस्थायी गिरावट ने तेल की ताजगी भरी कीमतें खींच लीं, जिससे कई एशियाई देशों के औद्योगिक एवं गृह उपयोग के लिए लागत तेज़ी से बढ़ी।

क्षेत्रीय प्रभाव स्पष्ट है। इंडोनेशिया और फ़िलिपीन्स के बड़े‑शहरों में, जहाँ सड़कों की हर एक धूप में नटखट बिजली सेक्टर की उदासी झलकती है, बसों और ट्रेन एसी के बिना परिचालन जारी हैं। थाईलैंड में, छात्रावासों के कमरों में पंखे ही अब एक‑एक किले की तरह लगते हैं—जैसे सरकारें पेट्रोल और बिजली की कीमतों को ‘अस्थायी अनुपातिकता’ की सीमा में रखेगी, मगर देर से। भारत के कई राज्य, विशेषकर उत्तर-पूर्वी हिस्से, जहाँ जलवायु पहले ही उमस भरी है, वह भी इस आपूर्ति‑शृंखला के धक्का से झकझोर रहे हैं। राष्ट्रीय तापीय शक्ति संयंत्रों में लोड‑शीडिंग के कारण, कई स्कूलों को दो‑तीन घंटों के लिए ही इलेक्ट्रिक एसी चलाने की अनुमति मिली है; वाडियों में सर्दी‑समय के फैन को ही ‘शीतलन’ माना जा रहा है।

नीति‑निर्णायक इस असुविधा को दो‑तीन प्रमुख धारा में बाँध रहे हैं। एक ओर, विभिन्न सरकारें ऊर्जा‑सावधानी अपनाते हुए शहरी बिजली ग्रिड में ‘स्मार्ट मीटर’ और ‘डायनामिक प्राइसिंग’ लागू कर रही हैं—जिसका उद्देश्य अनियंत्रित ड्रैडेड लोड को नियंत्रण में लाना है। दूसरी ओर, झंझट‑भरी नियमावली के कारण, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों—जैसे सौर‑शक्ति‑आधारित एसी—की स्वीकृति प्रक्रिया किनारे पर धूमिल रहती है। इस बीच, पंतप्रधान द्वारा घोषित ‘शीतलन के लिये राष्ट्रीय योजना’ में दाने‑दाने में रियायती गैसस्लेट्स प्रदान करने का वादा है, परंतु अतीत में इसी तरह के वादों के अंजाम देख कर जनता के होंठों पर हल्की सी मुस्कान ही बची है।

वैश्विक शक्ति‑संतुलन में इस वाक्यांश को एक चतुर टिप्पणी के रूप में देखा जा सकता है: जब मध्य‑पूर्व में जमीनी युद्ध ऊर्जा को अस्थिर कर देता है, तो दक्षिण‑एशिया के संवेदनशील इलेक्ट्रिक ग्रिड ही सबसे पहले थरथराते हैं। इस ख़रीद‑बिक्री के खेल में, बड़ी शक्ति‑राष्ट्रों ने अपनी कुर्सी पर बैठ कर, ‘ऊर्जा सुरक्षा’ के नाम पर छोटे देशों को एक महँगा सबक सिखाया। चीन की ‘बेल्ट‑एंड‑रॉड’ नीति के तहत इरान के साथ ऊर्जा‑साझेदारी को पुनःसंतुलित करने की कोशिशें बेकार रहे, क्योंकि कच्ची तेल की कीमतें पहले ही ऐसी ऊँचाई पर पहुँच गईं कि किसी भी ‘समीक्षा‑क्रिया’ को जटिल बनाते हैं।

परिणामों की लहर अभी भी जारी है। ऊर्जा‑कमी से प्रभावित क्षेत्रों में, व्यवसायिक कार्यालयों की उत्पादकता घटती दिख रही है, और छोटे‑छोटे रेस्तरां अपने एसी को ‘ऑफ़‑पीरियड’ में बदलकर विज़िटर को वॉटर‑डिस्पेंसर की ‘शीतलन’ पेशकश कर रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग ने गर्मी‑से‑जुड़ी बीमारियों के मामलों में 12 % की वृद्धि की चेतावनी दी है, विशेषकर वृद्धों तथा बच्चों में, जो अब निरंतर तापमान के शिकार बन रहे हैं।

समापन में कहें तो, इरान में युद्ध द्वारा उत्पन्न ऊर्जा‑अस्थिरता ने एशिया के कई हिस्सों में एक ‘सर्दी‑गर्मी की दोहरी लहर’ पैदा कर दी है—जहाँ गर्मी के कारण एसी की मांग बढ़ी, वहीं ऊर्जा आपूर्ति की गिरावट ने उसे रोक दिया। इस असंतुलन को ठीक करने के लिये, न केवल अल्प‑कालिक रियायतों पर भरोसा करना, बल्कि सौर‑ऊर्जा, पवन‑ताकत और पावर‑स्टोरेज जैसी स्वच्छ तकनीकों में निवेश को तेज़ करना आवश्यक है—वर्ना अगला गर्मी‑मौसम भी ‘एसी‑मुक्त’ ही रहेगा, और यही सबसे बड़ा राजनीतिक व्यंग्य होगा।

Published: May 7, 2026