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Category: दुनिया

एडम स्मिथ की नैतिक‑आर्थिक दोहरी समझ पर पुनर्विचार: सहानुभूति‑स्वार्थ के मिथको को सच्चाई से हटाना

वैश्विक आर्थिक इतिहास में एडम स्मिथ को अक्सर दो अलग‑अलग विचारधाराओं के प्रतीक के रूप में देखा गया—एक ओर "नैतिक सहानुभूति" वाले "द थ्योरी ऑफ़ मोरल सेंस" में, और दूसरी ओर "स्वार्थी बाजार" वाले "वेल्थ ऑफ़ नेशंस" में। इस विरोधाभास को कई दशकों से "एडम स्मिथ समस्या" कहा जाता रहा, जो नीति‑निर्माताओं और अकादमिकों दोनों को उलझन में डालता रहा।

हालाँकि, नवीनतम शैक्षणिक सर्वेक्षण यह स्थापित कर रहा है कि यह द्वैत केवल सतही पढ़ाई का परिणाम है। अधिकांश विद्वान अब मानते हैं कि स्मिथ ने मानवीय व्यवहार के दो पहलुओं—सहानुभूति और स्वार्थ—को एक ही व्यापक सिद्धांत में समेटा है, जिससे नैतिकता और आर्थिक गतिविधि के बीच एक अंतर्संबंध स्थापित हुआ। इस तर्क को "क्यूमिक फ्रेमवर्क" कहा जाता है, जिसमें व्यक्तिगत स्वार्थ सामाजिक भागीदारी को प्रोत्साहित करता है, जबकि सहानुभूति उस भागीदारी को नैतिक सीमाओं में बाँधती है।

यह पुनर्विचार न केवल शैक्षणिक सिद्धान्तों को फिर से लिखता है, बल्कि नीति‑निर्माताओं को भी निर्देशित करता है। भारत में हाल के आर्थिक सुधारों—जैसे बुनियादी ढाँचा निवेश को निजी क्षेत्र के साथ मिलाना और श्रम बाजार को लचीला बनाना—में अक्सर "स्वार्थी निवेशकों" की बात की जाती है, पर सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता कम आंकी जाती है। स्मिथ की एकीकृत दृष्टि बताती है कि यदि नीतियों में सहानुभूति‑आधारित सुरक्षा जाल नहीं जोड़े जाएँ तो बाजार‑उन्मुख कदम सामाजिक असमानताओं को तेज़ कर सकते हैं।

वैश्विक स्तर पर देखे तो, कई विकसित economies ने “क्लैस्ट्रोफ़ोबिक” आर्थिक मॉडल अपनाया है, जहाँ बाजार के आत्म‑सुधार के सिद्धान्त को सामाजिक शर्तों पर रखा गया है। इस मॉडल की असफलता, जैसे कुछ यूरोपीय देशों में उच्च बेरोज़गारी और सामाजिक असंतोष, स्मिथ की चेतावनी का प्रत्यक्ष प्रमाण हो सकती है—कि नैतिक संरचनाओं के बिना बाजार केवल "स्वार्थी शक्ति" बन जाता है।

बिना सटीक आलोचना के, संस्थागत अभिजात्य अक्सर स्मिथ को "स्वार्थी अर्थशास्त्री" के रूप में चित्रित कर अपने नीतिगत एजेंडा को वैधता देते हैं। यह उल्लेखनीय है कि स्मिथ के मूल ग्रंथों में आर्थिक सॉलिडारिटी, सार्वजनिक शिक्षा, और सार्वजनिक स्वास्थ्य पर स्पष्ट निर्देश मिलते हैं, जो आज की भारतीय नीति‑निर्माण प्रक्रिया में अत्यंत प्रासंगिक हैं।

संक्षेप में, "एडम स्मिथ समस्या" अब एक अतीत की बहस नहीं रह गई; यह एक नया विश्लेषणात्मक उपकरण बन गया है, जो यह पूछता है कि किस हद तक बाजार, नैतिकता और सामाजिक सुरक्षा आपस में जुड़ सकते हैं। भारतीय नीति‑निर्माताओं को इस एकीकृत दृष्टिकोण को अपनाकर आर्थिक वृद्धि को सामाजिक समानता के साथ समरसित करना ही चतुराई होगी—क्योंकि असली प्रश्न अब "स्वार्थ बनाम सहानुभूति" नहीं, बल्कि "सहानुभूति‑सजग स्वार्थ" है।

Published: May 5, 2026