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Category: दुनिया

उड़ते हुए पुराने स्काइडाइव प्लेन से दवा-भेजी ड्रोन‑शिकार, यूक्रेन के आकाश में नागरिकों की नई पंक्ति

रूसी क्युरिक‑साइज़्ड शहेड और एरोज़ ड्रोन ने यूक्रेन की विस्तारित सतही‑आकाशीय रक्षा को भारी दबाव में डाल दिया है। आधिकारिक एंटी‑एयर सिस्टम की आपूर्ति‑शृंखला धीमी और कभी‑कभी टूटती रहना, घावों की परवाह किए बिना, एक अजीब समाधान को जन्म दे रहा है: एक पुरानी स्काइडाइव विमान, जो कभी पैराशूट परोसता था, अब बिन‑अधिकार, बिन‑फॉर्मल ड्रोन‑हंटर बन गई है।

विमान मूलतः एक द्वि‑इंजन, भेड़िये‑जैसे लो-एंड का सिट्यूसैट (Cessna 182) था, जिसे तीन स्वयंसेवी तकनीशियन और एक पायलट ने रडार, थर्मल इमेजिंग और मोटर‑गन या हल्के‑रॉकेट सिस्टम से सुसज्जित किया। डेटा लिंक यूक्रेनी एयर डिफेन्स के कमांड कंट्रोल सेंटर से जुड़ा है, जिससे लक्ष्य‑सूची वास्तविक‑समय में अपडेट होती है। पायलट अक्सर व्यंग्य में कहते हैं, “हमारी पुरानी पंखों पर अब रडार है, पर हमारे सरकारी योजनाओं पर नहीं।”

यह अति‑सार्थक प्रयोग दर्शाता है कि आधिकारिक रक्षा तंत्र कितनी देर तक तैयार नहीं हो पा रहा है। यूक्रेन के रक्षा मंत्रालय को अक्सर विदेशी सहायता के इंतजार में रहने का आरोप लगाया जाता है, जबकि यूएस और नाटो के स्तर पर नए सिचेट सिस्टम की डिलिवरी योजनाएँ “पर्याप्त शीघ्रता” से अधिक “शुरुआती चरण” में दिखती हैं। परिणामस्वरूप, नागरिकों को खुद को “आकाशीय मीटिंग पॉइंट” बनना पड़ता है, जहाँ वे आधिकारिक तौर पर नहीं, बल्कि असुरक्षित रूप से ड्रोन‑शिकारी का रोल निभाते हैं।

अंतर्निर्हित परिणाम सीमित ही रहे हैं: कुछ दर्जन शहेड ड्रोन नीचे गिराए गए, जबकि रूसी पक्ष द्वारा प्रतिदिन लॉन्च किए जाने वाले हज़ारों ड्रोन में यह संख्या नगण्य है। इसका असली लाभ शायद मनोवैज्ञानिक है – नागरिकों के बीच एक नया साहसिक कहानी, और रूसी हमले को “सिर्फ़ टिंडर” बनाना। लेकिन यह भी साक्ष्य है कि अप्रकाशित लाचारी को “गैजेट‑भरी निराशा” में बदलना, व्यवस्थित रक्षा योजना के मुद्दों को नहीं सुलझाता।

भारत के लिए यह परिदृश्य दोहरी शिक्षा देती है। एक ओर, भारतीय रक्षा उद्योग तेज़ी से स्वदेशी एंटी‑ड्रोन तकनीक विकसित कर रहा है, लेकिन फिर भी परम्परागत बड़ी शस्त्र प्रणाली पर बहुत अधिक निर्भरता है। दूसरी ओर, दिल्ली अक्सर रूसी‑यूक्रेनी संघर्ष को “सार्वभौमिक शांति” के दुभावन में रखकर अपने रणनीतिक संतुलन को बनाए रखती है, जबकि अपने पड़ोसी देशों की सीमाओं में मौजूद समान असमर्थता को नज़रअंदाज़ करती है। नागरिक‑आधारित निगरानी मॉडल को अपनाने का प्रलोभन जरूर है, पर उससे जुड़े कानूनी और नैतिक जोखिमों पर खुलकर चर्चा नहीं की जाती।

संक्षेप में, पुराने स्काइडाइव विमान का ड्रोन‑शिकार बनना नवाचार की कहानी है, लेकिन यह एक अस्थायी “प्लास्टर” है जो एक फटे हुए बैंडेज पर चिपका हुआ है। जब तक सरकारी रक्षा नीति कागज़ी कार्यवाही से बाहर नहीं निकलती, ऐसी असाधारण पहलकदमियाँ केवल आशा की झलक ही दे सकेंगी, न कि वास्तविक सुरक्षा का समाधान।

Published: May 5, 2026