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ईरान युद्ध से अरबपति कंपनियों की कमाई: रक्षा‑ऊर्जा के दोहरे लाभ
मास 2025 में ईरानी रॉकेटों ने मध्य‑पूर्व में अमेरिकी ठिकानों पर हमला किया, जिससे अमेरिकी‑सहयोगी देशों ने जवाबी हवाई अभियानों में कदम रखा। इस उन्मादी संघर्ष ने न सिर्फ मानवीय संकट बढ़ाया, बल्कि वैश्विक बाजार में एक तेज़ आर्थिक लहर भी पैदा की—जिसका सबसे बड़ा लाभ उन कंपनियों को मिला जिन्होंने शस्त्र और तेल दोनों में निवेश किया है।
संयुक्त राज्य के प्रमुख रक्षा समूह—लॉकहीड मार्टिन, रेइथॉन और नॉर्थ्रॉप ग्रुमैन—ने इस वर्ष के पहले छः महीनों में शेयर कीमतों में क्रमशः 22 %, 18 % और 24 % की बढ़ोतरी दर्ज की। उनका वार्षिक लाभ मार्जिन 2024 के 12 % से बढ़कर 19 % तक पहुंच गया, मुख्यतः इराक‑सिरिया‑ईरान युद्ध में निरंतर हथियारों की आपूर्ति के कारण। लेकिन इन आँकड़ों के पीछे छिपा तथ्य यह है कि कई अनुबंध गोपनीयता के कवच में बंद थे, जिससे सार्वजनिक निरीक्षण से दूर रखी गई ‘सुरक्षा‑सम्बन्धी संहिता’ के तहत मूल्य निर्धारण अनपेक्षित रूप से उच्च रहा।
यूरोप की ओर देखिए तो बीएई सिस्टम्स और थेलिस ग्रुप ने भी अपने राजस्व में दो अंकों की वृद्धि की घोषणा की। यूके के रक्षा निर्यात पर कड़ी आलोचना और निरंतर विरोध प्रदर्शन के बावजूद, सरकार ने “रक्षा‑उद्योग में निवेश” को राष्ट्रीय सुरक्षा की क्लासिक परिभाषा में डाल दिया—एक शब्दावली जो अब आर.ए. के “सुरक्षा‑संधियों” को आर्थिक लाभ में बदल देती है।
ऊर्जा क्षेत्र में तनाव और तेल के कीमतों में अस्थिरता ने ओपेक के धनी सदस्य—सऊदी अरामको, कुवैत पेट्रोलियम और यहां तक कि यूएई के ADNOC—को भी नई आय की धारा प्रदान की। 2025 के मध्य में ब्रीटेनियम के एक्सचेंज पर तेल की कीमतें 115 डॉलर से ऊपर चली गईं, जिससे इन कंपनियों के वार्षिक लाभ में क्रमागत 35 % की वृद्धि हुई। साथ ही, शिम्पेंज़ी‑आधारित शेषैंट कंपनियों ने उस दांव को भी उतारा—जो ईरानी प्रतिबंधों के तहत लेन‑देन को फॉर्मलाइज़ करने में मदद करती थीं, जिससे “कुशलता” की नई परिभाषा स्थापित हुई।
भारत इस परिप्रेक्ष्य में दो मोर्चों पर खड़ा है। एक तरफ महंगे तेल की कीमतों ने आयात बिल को पिछले वर्ष की तुलना में 15 % बढ़ा दिया, जिससे बैंकों को विदेशी मुद्रा आवंटन में दोगुनी दबाव पढ़ा। दूसरी तरफ, रक्षा मंत्रालय ने भारत‑निर्मित युद्धक विमान और रडार सिस्टम की मौजूदा पाइपलाइन को तेज़ करने का इरादा जताया, संभावित तौर पर हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स और एलएसआर का शेयर मूल्य “रक्षा‑बूम” से लाभ उठाने की सम्भावना रखता है। परंतु इस लाभ को एक सतह‑स्तर का “विदेशी तनाव‑भुगतान” भी कहा जा सकता है, क्योंकि भारतीय आम जनता को महँगे ईंधन और वस्तु‑मूल्य सूचकांक के रूप में सीधे बोझ झेलना पड़ रहा है।
क़ीमत‑आधारित नीतियों और वास्तविक लाभों के बीच की खाइल को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। जबकि विश्व नेताओं ने वार्ता‑मंदिर स्थापित करने और “शांतिपूर्ण समाधान” की पुकार की, कंपनियों ने “उत्पाद‑विनिमय” को प्राथमिकता देकर दांव को ऊँचा खींचा। यह दोहरा मानक न केवल लोकतांत्रिक नियंत्रण को कमजोर करता है, बल्कि सार्वजनिक विश्वास को भी क्षीण करता है—एक ऐसी स्थिति जहाँ “सुरक्षा” शब्दावली का प्रयोग “साफ़‑सफ़ेद लाभ” को ढकने के लिए किया जा रहा है।
Published: May 8, 2026