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ईरान ने खुद को सुपरपावर कहा, भारत‑ईरान रिश्ते ‘फूलते’ हैं
तेहरान में 6 मे 2026 को विदेशी मंत्रालय के प्रवक्ता इस्माइल बक़ाई ने एक साक्षात्कार में कहा कि ईरान अब एक सुपरपावर के रूप में उभरा है और भारत के साथ उसके संबंध ‘फूल-फूल’ रहे हैं। यह टिप्पणी तब आई जब ईरान ने अपने शांती प्रस्ताव पर अमेरिका की प्रतिक्रिया का पुनरावलोकन करने का एलान किया।
बक़ाई ने कहा कि ईरानी नेतृत्व ने अपने आर्थिक, सैन्य और कूटनीतिक क्षमताओं को ‘विस्मयकारी’ स्तर पर पहुंचा लिया है। उन्होंने यह उल्लेख करने को भी छोड़ा नहीं कि भारत इस नई शक्ति समीकरण में ‘एक भरोसेमंद साथी’ बन चुका है, जिससे दो देशों के बीच तेल‑वैन्य वाणिज्य, बुनियादी ढांचा और ऊर्जा‑सुरक्षा के समझौते तेज़ गति से आगे बढ़ रहे हैं।
ऐसे बयान को वैश्विक संदर्भ में देखना आवश्यक है। पिछले कुछ सालों में ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों ने उसकी आर्थिक पहुँच को सीमित किया, जबकि रियाद‑तेहरान साझेदारी और शिया‑नाटो कलह ने उसकी भू-राजनीतिक शिरायता को बढ़ावा दिया। इस परिप्रेक्ष्य में ‘सुपरपावर’ की घोषणा कुछ हद तक आत्म‑शांतिपूर्ण दिखती है, जैसे कि कोई देश अपने बायोटीन में अपनी ताकत को माप रहा हो।
भारत की दृष्टि से इस विकास में संभावनाएँ और सीमाएँ दोनों ही मौजूद हैं। नई दिल्ली ने पिछले दो दशकों में ईरान के साथ ऊर्जा‑आपूर्ति, ट्रांसपोर्ट‑कोरिडोर और विज्ञान‑प्रौद्योगिकी सहयोग को धीरे‑धीरे बढ़ाया है, परन्तु पश्चिमी व्यापारिक प्रतिबंधों के कारण भारतीय कंपनियों को जोखिम उठाना पड़ता है। इसलिए भारत का रवैया अभी तक ‘फूलते’ कहे जाने योग्य नहीं, बल्कि ‘सावधानीपूर्वक फलते-फूलते’ जैसा अधिक उपयुक्त है।
ईरान का अमेरिकी प्रतिक्रिया की समीक्षा करना भी रोचक है। बीते महीने इसने मध्य‑पूर्व में ‘शांतिपूर्ण समाधान’ हेतु एक प्रस्ताव रखा, जिसमें परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने के बदले आर्थिक प्रतिकूलताओं को हटाने का आह्वान किया गया। अमेरिका की प्रतिक्रिया अभी तक आधिकारिक तौर पर नहीं आई, परन्तु अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का अनुमान है कि वॉशिंगटन के भीतर अभी भी काफी संकोच है, विशेषकर क़राह‑ज़रव-जॉर्डन के कूटनीतिक गठबंधन की गहरी जड़ें देखते हुए।
जैसे ही ईरान इस प्रस्ताव का पुनर्मूल्यांकन करेगा, भारत को यह तय करना होगा कि वह इस ‘नई शक्ति’ को अपने रणनीतिक समीकरण में किस हद तक शामिल करना चाहता है। यदि अमेरिकी जवाब में ‘विचार‑विमर्श’ का स्वाद मिलता है, तो दिल्ली को दो धड़की स्थितियों—आर्थिक अवसर और प्रतिबंध‑जोखिम—के बीच संतुलन बनाना पड़ेगा। अन्यथा, ईरानी ‘सुपरपावर’ का अभिमान सिर्फ एक कूटनीतिक व्यंग्य बन कर रह सकता है, जिस पर दुनिया एक तरफ मुस्कुराएगी और दूसरी तरफ उसकी वास्तविक शक्ति को मापने की कोशिश करेगी।
Published: May 7, 2026