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ईरान के विदेश मंत्री ने नई "पोस्ट‑वार" रीजनल फ्रेमवर्क के लिए चीन से समर्थन मांगा
तेहरान के विदेश मंत्री मीर्ज़ा अराकची ने सोमवार को बीजिंग की एक दिवसीय यात्रा के दौरान बीजिंग सरकार को एक 'नई पोस्ट‑वार' क्षेत्रीय व्यवस्था के लिए समर्थन का अनुरोध किया। यह अनुरोध उसी समय आया जब संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 14‑15 मई को चीन के साथ द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन तय किया हुआ है।
अराकची का बयाना संकेत करता है कि ईरान एक ऐसा ढांचा तैयार करना चाहता है, जिसमें मध्य‑पूर्व, ईरान‑सऊदी जलवायु, और संभवतः यूक्रेन‑रूस संघर्ष के बाद की भू‑राजनीतिक प्रवृत्तियों को शामिल किया जाए। चूंकि चीन को अब तक कई संघर्ष‑परिणामी पुनर्संरचना प्रस्तावों में मध्यस्थ कहा गया है, राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ सुदृढ़ संबंध को आधार बनाकर ईरान इस ढांचे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उतारने की कोशिश कर रहा है।
वैश्विक संदर्भ में देखा जाए तो यह कदम ईरान की परम्परागत एकतरफ़ा पश्चिमी दबाव नीति से अलग, बीजिंग के साथ सह-रचनात्मक गठबंधन की ओर उन्मुखीकरण को दर्शाता है। आइरन को वार्षिक सैद्धांतिक प्रतिरोध के बाद, बनारस और तेल‑बंदर जैसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे पर भारत-ईरान आर्थिक सहयोग के संभावित विस्तार को भी इस कदम से प्रभावित हो सकता है। भारत का अपना शून्य‑उत्सर्जन लक्ष्य और पश्चिमी ऊर्जा सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए, ईरान‑चीन गठबंधन का नजदीकी अवलोकन आवश्यक हो गया है।
संस्थागत आलोचना की बात करें तो, बीजिंग की विदेश नीति अब भी 'डॉलर‑परत्' की धुंध में पड़ी है: एक ओर वह चीन‑रूस, चीन‑ईरान जैसी मुलाक़ातें कर रहा है; तो दूसरी ओर वह अमेरिकी राष्ट्रपति की दो‑दिन की यात्रा से पहले ही अस्थिर शंकु में घुँस गया है। इस तरह की दोहरी चालें अक्सर कूटनीतिक रूप से आकर्षक लगती हैं, पर वास्तविक नीति‑निर्माण में अंतराल छोड़ देती हैं। ट्रम्प‑शी शिखर सम्मेलन, जो पहले से ही व्यापार, साइबर‑सुरक्षा, और दक्षिण‑चीन सागर के सवालों में उलझा हुआ है, अब इस ईरानी‑चीन पहल से नहीं बच पायेगा — यहाँ तक कि उन मुद्दों को भी टक्कर मिल सकती है, जिनके इर्द‑गिर्द दोनों पक्ष अक्सर आहिस्ता‑आहिस्ता अपनी-अपनी जगह बनाते हैं।
अंततः, यदि चीन इस नई रीजनल फ्रेमवर्क को राजनयिक समर्थन प्रदान करता है, तो वह मध्य‑पूर्व में अपनी प्रभावशीलता को बढ़ा सकता है, जबकि अमेरिका को अपने एशिया‑पैसिफिक रणनीतिक संतुलन को पुनः मूल्यांकन करना पड़ेगा। भारत के लिए यह दोहरे तनाव का क्षण एक अवसर भी हो सकता है: वह अपनी ऊर्जा सुरक्षा के साथ-साथ रणनीतिक स्वायत्तता को सुरक्षित रखने के लिये दोनों महाशक्तियों के बीच संतुलन बनाने में सक्रिय भूमिका निभा सकता है।
Published: May 6, 2026