ईरान का इरादे का दिखावा और यू.एस. का 'मार्गदर्शन' – हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में तनाव फिर बढ़ा
बीते कुछ दिनों में हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय राजनयिक मंच की फॉरेस्ट बंधक बन गया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने घोषणा की कि अमेरिकी नौसेना ‘मार्गदर्शन’ करेगी, जिससे जलडमरूमध्य में फँसे किसी भी जहाज़ को बाहर निकाला जा सके। उसी शाम, ईरान के मुख्य सैन्य कमांडर मेजर जनरल अली अब्दोल्लाही ने स्पष्ट कर दिया कि इस जलडमरूमध्य में बिना समन्वय के प्रवेश करने वाले किसी भी विदेशी युद्ध बल का सामना ‘कठोर प्रतिक्रिया’ से किया जाएगा।
दावा किया जा रहा है कि ईरानी सेना ने एक अमेरिकी युद्धपोत को जलडमरूमध्य में प्रवेश करने से रोक दिया। वास्तविकता—या कम से कम हमारी रिपोर्ट—कि नहीं, इसका अभी तक कोई स्वतंत्र प्रमाण नहीं मिला है। लेकिन ईरान के आधिकारिक बयानों की निरंतरता यह दर्शाती है कि यह क्षेत्र उनके राष्ट्रीय सुरक्षा के ‘पर्याप्त कड़ी’ में आता है, चाहे उस ‘पर्याप्त’ में किन‑किन आर्थिक और कूटनीतिक नुकसानों को सम्मिलित किया गया हो।
उसी समय, अमेरिकी प्रशासन ने ‘बहुत सकारात्मक’ वार्ताओं का हवाला देते हुए कहा कि वह ईरानी अधिकारियों के साथ संवाद के रास्ते खोल रहा है। यहाँ एक विरोधाभास स्पष्ट है: एक तरफ ‘मार्गदर्शन’ का वचन, तो दूसरी तरफ ‘प्रतिकार’ की धमकी। यह दोहरी नीति पिछले कई दशक की अमेरिकी‑ईरानी खेल का नया संस्करण प्रतीत होती है, जिसमें शब्दों की भारी मात्रा में ‘सहयोग’ और ‘धमकी’ दोनों साथ‑साथ चलती हैं। यह देखना बाकी है कि इस शब्द‑जाल में कौन‑सी सच्ची कार्रवाई निकलेगी।
भारत की दृष्टि से हॉर्मुज़ की महत्ता किसी से कम नहीं। हमारा अधिकांश कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद इस जलडमरूमध्य से होकर पारित होते हैं। यदि इस रास्ते में कोई भी व्यवधान उत्पन्न होता है, तो देश की ऊर्जा लागत में वृद्धि, बुनियादी वस्तुओं की कीमतों में इन्फ्लेशन और उद्योगों में उत्पादन‑अधिकार‑हानी जैसी समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं। भारतीय नौसेना ने पहले भी इस जलडमरूमध्य में ‘सुरक्षा‑सहयोग’ की संभावनाओं को लेकर संकेत दिया था, परंतु वह भी अमेरिकी‑ईरानी द्विपक्षीय टकराव में कहीं फँसने के डर से सावधान दिखी।
वास्तव में, ईरान की इस तरह की ‘सुरक्षा‑हिफाज़त’ की घोषणाओं को खोल‑झोल-से या तो ‘प्रतीकात्मक शक्ति‑प्रदर्शन’ या ‘वास्तविक आर्थिक प्रतिबंध’ के रूप में समझा जा सकता है। उसके साथ जुड़ी कूटनीतिक परतें भी उलझी हुई हैं: ईरान अपने शेल्फ‑शेड में रूस, चीन और अन्य गैर‑पश्चिमी मोर्चों से समर्थन की तलाश करता है, जबकि अमेरिका इस जलडमरूमध्य को अपनी ऊर्जा‑सुरक्षा का ‘लॉजिस्टिक हब’ मानता है। इस द्वैधता के बीच, छोटे‑मोटे राष्ट्र—भारत सहित—को अपने ‘सुरक्षा‑हैबिटेट’ को पुनःनिर्धारित करना ही पड़ेगा।
उपर्युक्त सबको मिलाकर देखा जाए तो अंतरराष्ट्रीय संस्थानों का ‘सुरक्षा‑वचन’ और सदस्य देशों का ‘आर्थिक‑मनोरथ’ अब एक ही पैराग्राफ में टकराते दिखते हैं। विस्तृत रूप में, अमेरिकी नौसेना का ‘मार्गदर्शन’ तो एक पुरानी नौकायन परम्परा की तरह लग रहा है, परंतु इसकी क्षमता तब तक सीमित रहेगी जब तक ईरान की ‘अटूट’ रक्षा‑नीति को समझौता नहीं किया जाता। यदि दोनों पक्षों में से कोई भी ठोस कदम नहीं उठाता, तो हॉर्मुज़ में ‘सुरक्षा‑संवाद’ की दीवार को तोड़ने की बजाय, अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में ‘स्थिरता‑ह्रास’ की लहरें उठ सकती हैं—और भारत के तेल‑बिल्डिंग में धुंधला पानी इसी घूँट में मिल सकता है।
Published: May 4, 2026