ईरान‑इज़राइल संघर्ष में कगार पर शांति, यूएस के ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ ने खींची हॉरमुज़ जलमार्ग की टोकरी
पाँच मई, 2026 — मध्य पूर्व में दो बड़े प्रतिद्वंद्वियों के बीच छिड़ा युद्ध फिर एक नाज़ुक मोड़ पर पहुँच गया है। इज़राइल‑ईरान संघर्ष की आवाज़ें आजीवन शैली के टैंकों और ड्रोन के बीच बयाँ हुईं, जबकि आख़िरकार दोनों पक्षों ने एक अस्थायी बन्द‑गोला प्रस्ताव पर विचार किया। लेकिन शांति के इस क्षणिक पलों को धुंधला करने का काम यू.एस. के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नई पहल, “प्रोजेक्ट फ्रीडम” द्वारा किया गया।
प्रोजेक्ट फ्रीडम का दावा है कि वह स्ट्रेट ऑफ़ हॉरमुज़ को पूरी तरह से अंतर्राष्ट्रीय शिपिंग के लिये खोल देगा—एक जलमार्ग जो दुनियाभर के तेल और गैस निर्यात का लगभग दो‑तीसरा हिस्सा ले जाता है। इस योजना को लॉन्च करने के तुरंत बाद ईरान ने अपने गुप्त‑सैन्य नेटवर्क से कई लक्ष्य पर अंतरिक्ष‑स्तर के मिसाइल प्रहार किए, जिन्हें दुश्मन की सजा‑सुविधा से बचने के बहाने अपनाया गया। ईरान की ओर से यह चेतावनी स्पष्ट थी: “यदि कोई हमारे जलमार्ग को राजनीतिक खेल के पियन की तरह इस्तेमाल करेगा, तो हमें जवाब देना पड़ेगा।”
इसी बीच, संयुक्त अरब अमीरात ने अपने क़रीबी समुद्री बेसों से कई बार घातक हमला दर्ज किया, जिसमें बहु‑स्तरीय ड्रोनों और नौसैनिक बमबारी के संकेत मिले। यूएई के बयान में कहा गया कि ये “पर्याप्त प्रमाण हैं कि क्षेत्र में स्थितियों का बिगड़ना कभी‑कभी अपने सुदूर रणनीतिक निहितार्थों से अधिक हिंसात्मक हो सकता है।” इन घटनाओं ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एक बार फिर दो‑तरफा विरोधाभासों के बीच फँसा दिया: जब बड़े‑पन वाले राष्ट्र शांति की दोहराई हुई घोषणा करते हैं, तो वही पावर‑ब्लॉक्स छोटी‑छोटी जल-मार्गीय योजनाओं से तनाव को प्रज्वलित कर देते हैं।
भारत के लिए इस परिदृश्य का अर्थ सिर्फ एक बीमार समाचार पत्र नहीं है। भारत की तेल आयात‑आधारित अर्थव्यवस्था स्ट्रेट ऑफ़ हॉरमुज़ पर भारी निर्भर है; किसी भी व्यवधान से तेल की कीमतों में उछाल, डीज़ल की कीमतों में बढ़ोतरी और वस्तु बाजार में सापेक्ष‑व्यापारिक अस्थिरता जड़ित हो सकती है। भारतीय नौसेना ने पहले ही अपनी समुद्री सुरक्षा ऑपरेशन‑इंडियन‑ऑशन को विस्तारित कर क्षेत्रीय सतह पर निगरानी बढ़ा ली है। भारतीय व्यापारियों ने भी वैकल्पिक रूट—दुबई‑ब्यूनस आयर्स के बीच “ड्रैग‑एंड‑ड्रॉप” मॉडल—को पहले से तैयार करने का संकेत दिया है, ताकि किसी भी आकस्मिक बंद‑गाव को मात दी जा सके।
कूटनीति के इस खेल में दो प्रमुख अंश सामने हैं। पहला, ट्रम्प प्रशासन की “फ्रीडम” पैंटिंग, जो वाणिज्यिक हितों को सैनेटरी जाँच‑परखा से बचाने के लिये “स्व-निर्णायक” कहा जाता है, परन्तु व्यावहारिक रूप में अंतरराष्ट्रीय समुद्र‑कानून की रक्षा के लिये कई दुबला‑रकट प्रोटोकॉल को मोड़ा‑तोडा है। दूसरा, ईरान की प्रतिक्रियात्मक शक्ति—हॉरमुज़ को “घातक रूट” घोषित करके—बिना किसी वैकल्पिक कूटनीतिक चैनल को खोलने के जोखिम में खुद को घेर रहा है। इन दोनों में से कोई भी रणनीति वास्तविक शांति या स्थिरता की राह नहीं खोलती; बल्कि यह दर्शाता है कि बड़े‑दावों के पीछे छोटी‑छोटी “स्थिरता” की कीमत अक्सर भू-राजनीतिक खेल‑भूमि में अनदेखी रह जाती है।
वर्तमान में, यू.एस. और उसके निकट सहयोगियों का एक अनौपचारिक “शर्त‑बिना‑शर्त” समझौता बन रहा है: “यदि हॉरमुज़ खुलता है, तो ईरान और इज़राइल को यू.एस. के मध्यस्थता‑सत्र में भाग लेना पड़ेगा।” यह शर्त, यदि लागू होती है, तो भारत जैसे निर्यात‑पर‑निर्भर देशों को एक सटीक, लेकिन जोखिम भरी, डिप्लोमैटिक जाल में फँसा सकती है। अब समय है कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय इस जलमार्गीय तनाव को केवल “परियोजना” तक सीमित रखे, न कि “परिणाम” के रूप में विश्व अर्थव्यवस्था में उत्पन्न नया असंतुलन बनावट दे।
Published: May 5, 2026