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Category: दुनिया

इरान के सांसद का बयान: होर्मुज जलडमरूमध्य युद्ध के बाद पहले जैसा नहीं रहेगा

तेहरान में सत्र के दौरान इरानी विधायक ने खुला आश्वासन दिया कि यू‑एस एवं इज़राइल के साथ हुए हालिया संघर्ष के बाद स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का पूर्व‑स्थिति में वापसी कभी नहीं होगी। उनका तर्क है कि इस जलडमरूमध्य को अब ‘सैन्य‑सुरक्षित’ क्षेत्र घोषित किया जाएगा, जहाँ शिपिंग पर कड़ी निगरानी और संभावित हत्यारों की तैनाती अनिवार्य होगी।

इस बयान का समय नियोजन‑सापेक्षतः उल्लेखनीय है। 2025‑26 के शरद ऋतु में अमेरिकी‑इज़राइली गठबंधन ने तेज़ी से इराक व सीरिया की सीमाओं को पार कर इरान के मुख्य बंदरगाहों को लक्षित किया, जिससे तेल निर्यात में दो‑तीन हफ्तों की झटके की मार लगी। अंतर्राष्ट्रीय व्यापार हेतु होर्मुज की रणनीतिक महत्ता अनदेखी नहीं की जा सकती; यह विश्व तेल बाजार के लिये ‘ग्लोबल ब्रेस्टबॉर्न’ के समान है, जहाँ हर दिन का व्यवधान कीमतें उछालता है।

इरान की इस नई रणनीति के संभावित परिणाम दो‑मुखी हैं। एक ओर, वह स्वयं को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं – “भारी‑बंदूक” की फुर्ती से समुद्री मार्गों को नियंत्रित कर, वह तेल को ‘भुगतान‑सुरक्षित’ बनाना चाहते हैं। दूसरी ओर, यह अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग के सिद्धांतों के तहत यूएन समुद्री कानून (UNCLOS) और अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) की असहनीय चुनौतियों को जन्म दे सकता है। व्यावहारिक रूप से, यदि इरान अस्थायी प्रतिबंध या ‘जोन‑ऑफ़‑हॉस्पिटैलिटी’ लागू करता है, तो विश्व व्यापारी, विशेषकर भारत, को वैकल्पिक मार्गों या अधिक महंगे बीमा‑प्रीमियम पर निर्भर होना पड़ेगा।

भारत के लिए असर तेज़ी से स्पष्ट हो रहा है। मध्यम‑आकार के तेल आयातकों को अब अपने रूढ़िवादी आपूर्ति श्रृंखलाओं को दोहराने के अलावा अन्य विकल्पों की तलाश करनी पड़ेगी – शायद अफ़गानिस्तान‑पश्चिमी तुर्की समुद्री मार्ग या अफ्रीका के केप ऑफ़ गुड होप के आसपास की दूरी। दोनों ही विकल्प लागत‑बढ़ोतरी और समन्वय‑जटिलता का कारण बनेंगे। साथ ही, भारत की सुरक्षा‑सेना के लिये भी यह क्षेत्र नई चुनौती पेश करेगा, जब तक कि इरान के ‘सुरक्षित क्षेत्र’ का मानदंड ‘दुश्मन जहाज़ों के परीक्षण‑पैटर्न’ से स्पष्ट नहीं हो जाता।

परिणामस्वरूप, अंतरराष्ट्रीय समुदाय में दो ध्रुवीय ध्वनियों का उभरना अपेक्षित है। एक ओर, पश्चिमी प्रमुख शक्ति, विशेषकर अमेरिका, ने पहले ही तैनात नौसैनिक बलों को कम करने और ‘डिप्लोमैटिक रीसेट’ की कूटनीति शुरू कर दी है, मगर इसका वास्तविक प्रभाव अभी तक स्पष्ट नहीं है। दूसरी ओर, ईरान के भीतर से यह आशावाद निरन्तर बढ़ रहा है कि यह “न्यायसंगत सुरक्षा” सिद्धांत को वैश्विक नियमविधान में बुन सकता है।

संक्षेप में, होर्मुज जलडमरूमध्य का भविष्य अब किसी भी पुराने मानचित्र जैसा नहीं रहेगा। इरान के इस घोषणा को सिर्फ एक मौखिक प्रतिरोध नहीं, बल्कि रणनीतिक पुनर्संरचना के रूप में देखना चाहिए – जहाँ महाशक्तियों की नीतियों और वास्तविक कार्यवाही के बीच की दूरी, अब और केवल भाषाई खेल नहीं, बल्कि आर्थिक‑सुरक्षा की वास्तविक स्थिति बन गई है। भारतीय नीति निर्माताओं को इस बदलाव को अपने ऊर्जा‑सुरक्षा आरेख में जल्द‑से‑जल्द शामिल करना होगा, वरना ‘शिप‑ऑफ़‑एज’ के अलग‑अलग अध्याय उन्हें महँगे पड़ सकते हैं।

Published: May 4, 2026