इमेरात, ओमान में ड्रोन‑मिसाइल दाग और हर्मुज में नौसेना टकराव ने यू.एस.-ईरान समझौते को नाज़ुक बना दिया
अप्रैल के मध्य में बंधे यू.एस.-ईरान शांति समझौते को अब पहले ही महीने में दो झटके लगे हैं। मई 4 को दुबई के निकट इमेरात और ओमान के तटों पर ड्रोन‑मिसाइल बमबारी हुई, जबकि स्ट्रेट ऑफ़ हर्मुज में अमेरिकी नौसैनिक जहाज़ और इरानी तगड़ा‑आक्रमण कक्षीय जलयान के बीच घातक मुठभेड़ दर्ज हुई।
प्रारम्भिक रिपोर्टें बताती हैं कि वे मिसाइलें और ड्रोन ईरान‑समर्थित मिलिशिया समूहों ने भेजी, पर ईरान ने सीधे इन कार्यों को अस्वीकार किया। वहीं, अमेरिकी नौसेना ने कहा कि उसके जहाज़ ने ‘स्वयं रक्षा’ के तहत इरानी तेज़‑गति वाले पोत को चेतावनी गोली चलाकर रोक दिया। दोनों पक्षों के बीच संवाद की कमी इस बात को स्पष्ट करती है कि कागज़ी समझौते से व्यावहारिक रूप से कोई अंतर नहीं बन रहा।
ऐसे घटनाक्रम सिर्फ द्विपक्षीय तनाव नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति‑दृश्य में भी धूमिल संकेत देते हैं। अमेरिकी रणनीति अब भी ‘इरान को रोकना, साथ ही तेल‑आधारित हिस्सेदारी सुरक्षित रखना’ पर केंद्रित है, जबकि ईरान ‘क्षेत्रीय प्रभाव को पुनः स्थापित करने’ के लिये प्रॉक्सी समूहों का प्रयोग जारी रखता दिख रहा है। इस बीच, चीन‑रूस दोनों ही मध्य‑पूर्व में अपने स्वर को ऊँचा करने की कोशिश कर रहे हैं, जिससे पराइडाइल में विनाशकारी प्रतिद्वंद्विता की संभावना बढ़ रही है।
भारत के लिए यह परिदृश्य सीधे‑सीधे महत्त्वपूर्ण है। स्ट्रेट ऑफ़ हर्मुज विश्व के सबसे व्यस्त तेल परिवहन गलियारों में से एक है; यहाँ की अस्थिरता भारत की कच्चे तेल की आयात लागत को कूद‑कूद कर बढ़ा सकती है। साथ ही, भारतीय प्रवासी समुदाय और भारतीय नौसैनिक बल दोनों इस जलमार्ग में अपने‑अपने मिशन पर हैं। भारतीय विदेश मंत्रालय ने ‘सभी पक्षों से शांति व संयम का आह्वान’ किया, जबकि नई दिल्ली ने संभावित असुरक्षा को देखते हुए अपने पश्चिमी पोर्ट‑कॉल में सुरक्षा बलों की तैनाती की तैयारी जाहिर की है।
नीति‑घोषणाओं और वास्तविक प्रभाव के बीच का अंतर यहाँ स्पष्ट है। यू.एस. ने ‘स्थायी शांति’ का दावा किया, पर उसकी नौसैनिक उपस्थिति अब भी ‘संकट‑प्रतिक्रिया’ के रूप में ही प्रयोग में लाई जा रही है। ईरान ने कूटनीतिक शब्दों में ‘संयुक्त सुरक्षा’ की बात कही, फिर भी उसके प्रॉक्सी समूहों की प्रचंड कार्रवाई सतह पर दिखती है। इस दोधारी तलवार से स्पष्ट होता है कि न तो संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता, न ही क्षेत्रीय सुरक्षा गठबंधन, वर्तमान में इस तनाव को शीतलित करने में सक्षम हैं।
स्मार्ट‑ड्रोन और सटीक मिसाइल के इस युग में शांति कागज़ पर लिखी जा सकती है, पर जब कागज़ की दरारें धातु की ख़राश में बदलती हैं, तो कूटनीति के इंजीनियरों को अब काली धातु की फ़ॉर्मूला बनानी पड़ेगी। छोटे‑छोटे शत्रुता के इस साखे पर, अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर भारत, को एक ‘सतर्क लेकिन सक्रिय’ नीति अपनानी होगी; नहीं तो अगले महीने की सत्र में मौजूद धुंधली शांति कोई और भी गहरी दरार में बदल सकती है।
Published: May 5, 2026