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Category: दुनिया

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इटली की प्रधानमंत्री गिरिजा मेलोनी ने डीपफेक फोटो को राजनीतिक हमला कहा

इटली की प्रधान मंत्री गिरिजा मेलोनी ने 6 मई 2026 को सोशल मीडिया पर देखी गई एक झूठी तस्वीर को 'राजनीतिक हमला' करार दिया। उस फोटो में मेलोनी को एक ऐसा दृश्य दिखाया गया था, जो न तो वास्तविक था, न ही कभी बनाया गया – बल्कि एक उन्नत डीपफेक तकनीक की नतीजा था। मेलोनी ने तुरंत विज्ञप्ति जारी कर कहा, "डीपफेक एक खतरनाक उपकरण है, क्योंकि यह किसी को भी धोखा दे सकता है, प्रभावित कर सकता है और निशाना बना सकता है"।

यह घटना कई घंटों में वायरल हो गई, जबकि इटली के कई बड़े समाचार चैनलों ने इस फ़ोटो की प्रामाणिकता पर सवाल उठाते हुए इसे ‘डिजिटल गड़बड़ी’ बताया। असली तस्वीर का अभाव और तेज़ी से फैली आलोचना ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उठाया।

ग्लोबल संदर्भ में, डीपफेक तकनीक का दुरुपयोग पिछले कुछ वर्षों में बढ़ता गया है। यूरोपीय संघ ने इस वर्ष ‘डिजिटल सर्विसेज एक्ट’ के तहत प्लेटफ़ॉर्मों को झूठी सामग्री पर तेज़ कार्यवाही करने का आदेश दिया है, परन्तु आलोचक कहते हैं कि औपचारिक नियम अक्सर तकनीकी बदलावों की गति को पकड़ नहीं पाते। इसी तरह, भारत में भी चुनावी प्रचार में डीपफेक का उपयोग बढ़ा है, जिससे आईटी एक्ट में संशोधन की पुकार तेज हो रही है। भारतीय मीडिया और आम जनता को भी इस प्रकार के ध्रुवीकरण का सामना करना पड़ रहा है, जहाँ एक झूठी वीडियो या फोटो राष्ट्रीय तनाव को बढ़ा सकता है।

मेलोनी की प्रतिक्रिया ने इटली सरकार को एक दोहरा झटका दिया: प्रथम, डिजिटल सुरक्षा के लिए कड़े नियम बनाने का दबाव, और द्वितीय, मौजूदा प्लेटफ़ॉर्मों की जवाबदेही पर अटकलें। आजा हुआ प्रस्ताव, जिसमें सामाजिक मीडिया कंपनियों से डीपफेक की पहचान और हटाने के लिए अल्गोरिदमिक अनिवार्यता मांगी गई है, अभी भी संसद में बहस का विषय बना हुआ है। कई विशेषज्ञ इसे केवल ‘धर्मिलर’ शब्दों के साथ लिपटे हुए ‘औपचारिक सौदा’ कह कर टालमटोल कर रहे हैं।

इटली में इस घटना ने इस बात को उजागर कर दिया है कि तकनीकी नवाचार कितनी जल्दी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को धुंधला कर सकता है। जबकि मेलोनी ने इस पर राष्ट्रीय सुरक्षा के शिलालेख में चेतावनी दी, वास्तविक कार्रवाई अभी भी अर्ध-आधारभूत बनी हुई है। भारत में भी इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों की निगरानी और सन्देहास्पद सामग्री की त्वरित पहचान पर समान बहस चल रही है, जहाँ सरकार को विदेशी दबाव और घरेलू लाबा-झपटी के बीच संतुलन बनाना कठिन लग रहा है।

सार में कहा जाए तो, इटली की यह ‘डीपफेक’ शिकायत केवल एक राष्ट्रीय मुद्दा नहीं, बल्कि वैश्विक सूचना सुरक्षा की लंबी लड़ाई का प्रतिबिंब है। यह दर्शाता है कि जब तक डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों को क़ानूनी बाध्यताओं और नैतिक ज़िम्मेदारियों के बीच स्पष्ट सीमा नहीं दी जाती, लोकतंत्र के लिये खतरों का खाका वैसा ही बना रहेगा।

Published: May 6, 2026