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Category: दुनिया

इज़राइल ने गाज़ा में शांति समझौते का उल्लंघन किया, अंतरराष्ट्रीय धैर्य पर कसौटी

स्थापित शांति समझौते के हस्ताक्षर के मात्र दो माह बाद, इज़राइल ने गाज़ा पट्टी में प्रतिबंधित सैन्य परिचालन जारी रखे। संयुक्त राष्ट्र, मिस्र और संयुक्त राज्य के मध्यस्थता से तैयार हुए समझौते में प्रतिपक्षीय फायरिंग रोकना, मानवीय सहायता का निर्वाह और सीमित इकाईयों की वापसी की शर्तें दर्ज थीं। लेकिन हवाई हमले, समुद्री ब्लॉकेड और नई बस्तियों की निकासी से यह वादा तेज़ी से टूट रहा है।

परिणामस्वरूप गाज़ा में नागरिक हताहतों की संख्या बढ़ी, बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं का वहन नहीं हो पा रहा है और लाखों लोग नई मानवीय संकट की कगार पर खड़े हैं। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस अड़चन पर कड़ी निंदा की – यूएन सुरक्षा परिषद ने आधिकारिक बयान जारी किया, जबकि यूरोपीय संघ ने इज़राइल को तत्काल शर्तों का पालन करने की पुनरावृत्ति की। फिर भी, यूएस के बयान में “एकीकृत रणनीतिक दृष्टिकोण” का उल्लेख करते हुए भी कुछ शब्दों में “सुरक्षा हितों के साथ सहयोग” को उजागर किया गया, जिससे दोधारी तलवार का अहसास हुआ।

इस बीच, भारत को द्विधारी कूटनीति का सामना करना पड़ रहा है। अपने रक्षा सहयोग, साइबर सुरक्षा और कृषि तकनीक के लिए इज़राइल के साथ लंबी साझेदारी रखता भारत, साथ ही अपने विशाल प्रवासी समुदाय और अंतरराष्ट्रीय मंच पर समतावादी मूल्यों के कारण फ़िलिस्तीन के पक्ष में भी लगातार आवाज उठाता आया है। विदेश मंत्रालय ने इस मुद्दे पर “मानवीय सहायता के लिए संयुक्त राष्ट्र के ढांचे के भीतर त्वरित कार्रवाई” का आह्वान किया, जबकि व्यापारिक हितों को संभालने के लिए द्विपक्षीय संवाद जारी है।

संकट की जड़ में बहुपक्षीय तंत्रों की अक्षम्य विफलता नज़र आती है। जब शांति का कागज़ तैयार हो, तो उसके ऊपर धब्बे ढूँढना स्वाभाविक लगता है – ऐसा ही अब गाज़ा के शहरों में दिख रहा है। यूएन की नीतिगत शक्ति सीमित है, जबकि यूएस का “दोस्त” कहना अक्सर “सुरक्षा और रणनीतिक लाभ” के साथ जुड़ा रहता है। इस असंतुलन ने अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रभावशीलता पर प्रश्न उठाए हैं और यह संकेत देता है कि शक्ति‑संतुलन में परिवर्तन न हो तो शांति समझौते सिर्फ कागज़ी औपचारिकता बन कर रह जायेंगे।

भविष्य की राह अभी भी अनिश्चित है। यदि इज़राइल शर्तों की नजरअंदाजी जारी रखता है, तो न केवल गाज़ा में मानवीय स्थिति बिगड़ती रहेगी, बल्कि मध्य-पूर्व की अस्थिरता यूरोपीय ऊर्जा सुरक्षा, अफ्रीकी समुद्री मार्गों और भारतीय व्यापारियों के लिए भी जोखिम उत्पन्न कर सकती है। इस परिदृश्य में भारत के लिए सबसे कठिन काम है – अपने रणनीतिक साझेदारियों को बिना मानवीय मूल्यों की समझौता किए संतुलित रखना।

Published: May 4, 2026