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Category: दुनिया

इज़राइल-ईरान संघर्ष से तेल कंपनियों को मिली भारी कमाई, कर लगाना क्यों कठिन?

फरवरी 2026 में इज़राइल और ईरान के बीच अचानक भड़की हुई सैन्य टकराव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को हिलाकर रख दिया। कई प्रमुख तेल‑गैस कंपनियों ने इस ‘ज्वारभाटा’ का फायदा उठाते हुए अपना लाभ दो‑तीन गुना कर दिया। इस पर लासो और यूरोपीय संसद के कुछ सदस्य अवैध रूप से अर्जित इस windfall पर कर लगाने की मांग करने लगे।

निवेशकों को सन्‍दिग्ध बनाते हुए, इस युद्ध ने उम्दा कीमतों को 2025 के औसत से 70 % तक पहुँचाया। परिणामस्वरूप, यूएस‑डॉ. एंड डब्ल्यू, शेल, एक्सॉनमोबिल जैसे दिग्गजों ने अपने वार्षिक लाभ में $30 अरब से अधिक का इज़ाफ़ा दर्ज किया। अब सवाल यह है कि क्या इस असाधारण मुनाफे पर एक असाधारण कर लगाया जाएगा, या यह केवल बहस का एक और चरण रहेगा।

संभव कर‑पहुंच को लेकर कई बाधाएँ सामने हैं। पहले, तेल‑गैस कंपनियों की लॉबिंग मशीनें पहले से ही ओपेक और कई राष्ट्रीय ऊर्जा मंत्रालयों के साथ घनिष्ठ जाल बुन चुकी हैं। वह अक्सर “ऊर्जा सुरक्षा” की बहाना‑बाज़ी में कर लगा देने के प्रस्ताव को “आर्थिक अस्थिरता” के रूप में खारिज कर देती हैं। दूसरा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार नियम, विशेषकर विश्व व्यापार संगठन (WТО) के प्रावधान, अचानक कर‑आदेशों को ‘मुक्त व्यापार’ के उल्लंघन के रूप में देख सकते हैं। तीसरा, विकसित देशों की बढ़ती बजट घाटा इन्हें इस कर को अपनाने के लिए प्रलोभित कर सकता है, परंतु साथ ही उनके भीतर “कौशल मुद्दे” के कारण राजनीतिक साहस भी घटेगा।

भारतीय पाठकों के लिए यह सवाल किन-किन बिंदुओं पर अधिक प्रासंगिक है? भारत हर साल लगभग 80 मिलियन टन की आयातित कच्ची तेल की माँग करता है, और विश्व‑ऊर्जा की कीमतों की अस्थिरता से भारतीय उपभोक्ता वस्तु मूल्य सूचकांक (CPI) में सीधे झटके महसूस करता है। यदि अमेरिकी और यूरोपीय राजनेता इस कर को लागू कर देते हैं, तो उनका औपचारिक बयान “ऊर्जा संक्रमण को तेज़ करने” के साथ जुड़ा रहेगा, मगर वास्तविक परिणाम में तेल की कीमतों में तरलता तो बढ़ेगी ही, पर साथ ही आयातित कच्चे तेल की लागत भी बढ़ेगी। इससे भारतीय कंपनियों के ब्रेक‑ईवन पॉइंट पर दबाव आएगा और उपभोक्ता मूल्य वृद्धि (inflation) में नयी पंक्तियाँ जुड़ेंगी।

ऊर्जा‑सुरक्षा के दोहरे मानदंडों पर भी गंभीर सवाल उठता है। जहाँ एक ओर विकसित देशों का दावा है कि “वित्तीय लाभों को पुनः वितरित करके जलवायु लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं”, वहीं वही राष्ट्रीय कंपनियां अपने तराजू पर “बाजार पहुंच” और “जियो‑पॉलिटिकल स्थिरता” को पहले रखती हुईं दिखती हैं। इस दोहरी धारणा पर व्यंग्य नहीं, बल्कि तीखा निरीक्षण आवश्यक है: कर के प्रस्ताव को अक्सर “राजनीतिक कॉस्मेटिक” कहा जा सकता है, जबकि असली एजेंडा तब बनता है जब कई देशों के राजनयिक दायित्व, पेट्रोलियम-आधारित आय पर निर्भर विकासशील अर्थव्यवस्थाओं, और उद्योग के स्वयं के “बाजार‑डिनामीकरण” के बीच टकराव होता है।

संक्षेप में, इज़राइल-ईरान युद्ध ने तेल‑गैस कंपनियों को आश्चर्यजनक “विंडफ़ॉल” दिया, पर यह कर‑आगेज़र का प्रश्न केवल आर्थिक गणना नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय नीतियों, व्यापार नियमों, और ऊर्जा‑सुरक्षा के गहरे द्वंद्व के बीच एक जटिल समीकरण है। भारत के लिए इसका मतलब: कभी‑काम की महँगी ऊर्जा‑नीति पर पुनर्विचार, और इस जटिल सृजन‑ध्वंस के दौर में सतर्क रहने की आवश्यकता।

Published: May 6, 2026