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Category: दुनिया

इ्रान ने हॉर्मुज में जहाज़ों को चेतावनी दी, ट्रम्प की जलमार्ग खोलने की योजना को रोका

तेरह मई, 2026 – इराकी-इरानी नौसैनिक कमांडर ने कहा कि स्ट्रेट ऑफ़ हार्मुज को बिना अनुमति के पार करने वाली किसी भी डकैती को ‘ख़तरे में’ माना जाएगा। यह बयान अमेरिकी नीति‑निर्माताओं द्वारा प्रस्तावित, ‘ट्रम्प‑सहायता योजना’ के प्रति प्रत्यक्ष प्रत्युत्तर था, जिसका उद्देश्य ईरान द्वारा लगाए गए नौकायन प्रतिबंध को तोड़ना था।

ईरान ने 2024 के मध्य में हार्मुज को प्रतिबंधित कर दिया था, जब सीरियाई जल में एक अमेरिकी ड्रोन को मार गिराया गया था। तब से तेल‑ड्रैगिंग जहाज़ों को या तो ईरानी अनुमतिपत्र दिखाने को कहा गया या फिर उन्हें समुद्र‑मार्ग से हटाने का इशारा किया गया। इस कदम ने विश्व तेल बाजार में अस्थिरता पैदा कर दी, जिससे ओमान के तेल मूल्य में अचानक 5% की उछाल देखी गई।

संयुक्त राज्य ने, जबकि आज भी “ट्रम्प‑प्रेरित” विचारधारा को आधिकारिक तौर पर नहीं अपनाता, एक समूह के माध्यम से ‘नौ-निषेध’ के खिलाफ एक सैन्य‑डिप्लोमैटिक अभियान तैयार किया था। योजना का प्रमुख बिंदु था – वाणिज्यिक जहाज़ों को सुरक्षा अनुबंध के तहत ‘स्वतंत्र’ कराना, जिसे कुछ विश्लेषकों ने ‘सुरक्षा का कपड़े में लिपटा फिर से हैमलेट बनने जैसा’ कहा।

भारतीय नीति‑निर्माताओं के लिए यह मुद्दा महज एक और अंतरराष्ट्रीय संघर्ष नहीं है; भारत का 80% से अधिक तेल आयात इस संकीर्ण जलमार्ग से होता है। लंदन के इकोनॉमिक टाइम्स के एक सर्वे में बताया गया कि यदि ईरानी ब्लॉकेड जारी रहा, तो भारत की आयात लागत में औसतन 7% तक की बढ़ोतरी हो सकती है। वहीं, भारत ने अब तक डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के नाम पर स्थापित ‘समुद्री सुरक्षा मंच’ के तहत दो द्वि-सप्ताहिक अभ्यास आयोजित किए हैं, लेकिन अधिकतर इस मंच का प्रयोग “व्याख्यात्मक शब्दों में बॉलबस्टर” बनकर रह गया है।

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने इस विषय पर दो बार बैठक बुला कर “खुले समुद्र के सिद्धांत” का पुनः‑उल्लेख किया, पर कड़ी शब्दावली की कमी ने स्पष्ट किया कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति अक्सर “शिष्टाचार के तत्परता” से अधिक क्रिया‑परिणाम नहीं दिखा पाती। असल में, इरानी आधिकारिक बयान में ‘खतरा’ शब्द का प्रयोग, ईरान के स्वर को सख्त रखने के साथ साथ, क्षेत्रीय ‘विवादों को बेकार की जलीबी’ से बचने के लिये भी था।

खराबी का एक पहलू यह भी है कि अमेरिकी नीति‑निर्माताओं ने शीतल जल में “ट्रम्प‑फैशन” का कपड़ा पहनते हुए, नियम‑बद्धता के बजाय ‘जबरनता का प्रयोग’ किया। इस प्रकार की रणनीति, जैसा कि विश्व शांति के ज्ञात वकील दिग्गज कहते हैं, “स्थिरता से दूर, कहर के करीब” है।

निष्कर्षतः, इरान का कठोर संदेश और अमेरिका की अति‑उत्साही योजना दोनों ही अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की दखल को ‘डूमेडेड’ कर रहे हैं। भारत, जो इस जलमार्ग से तेल की रेखीय धारा पर निर्भर है, को अब अपने वैकल्पिक रूट, जैसे कि अफ्रीकी समुद्री मार्ग या सुदूर पूर्वीय लिक्विफ़ाइड नेचर गैस पर अधिक निवेश करने की आवश्यकता है। यह संकीर्ण जलमार्ग फिर से “बहु‑शक्ति संघर्ष का नाट्य-मंच” बन सकता है, पर असली प्रभावी नीति‑प्रभाव तब आएगा, जब भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा को बहु‑मूल्य, बहु‑मार्गीय दृष्टिकोण से देखेगा।

Published: May 4, 2026