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Category: दुनिया

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इंडोनेशिया के प्रथम विमानवाहक पोत का अधिग्रहण: सुरक्षा बलवृद्धि या महंगा दांव

जाने-माने इतालवी नौसैनिक उपकरण ‘जोसैपे गारिबाल्डी’ को अब इंडोनेशिया के समुद्री हथियारागार में जोड़ने की तैयारी चल रही है। यह नौसैनिक पोत, 1970‑के दशक का एक‑हैंडेड बहुउद्देशीय विमानवाहक, आधिकारिक तौर पर इंडोनेशिया के लिए प्रथम कंधे‑पर‑हाथ (first‑on‑hand) विमानवाहक बनने वाला है। जबकि नौसैनिक प्रमुख रिआन फादिल्कार ने कहा है कि इस पोत को ‘गैर-युद्ध’ संचालन जैसे मानवीय सहायता, एंटी‑पाइरेसी और समुद्री निगरानी में प्रयोग किया जाएगा, सवाल यह बना रहता है कि क्या यह लागत‑भारी ‘गैजेट’ वास्तव में देश की समुद्री शक्ति को बढ़ाएगा या केवल एक महँगा शो‑पीस रहेगा।

इंडोनेशिया ने 2024‑के मध्य में इटली के साथ एक समझौता किया, जिसके अन्तर्गत गारिबाल्डी को 10‑साल की लीज़ पर ले‑लेना तय हुआ। इस सौदे में लगभग 1.2 बिलियन अमेरिकी डॉलर का खर्च अनुमानित है – इस आंकड़े में पोत की नवीनीकरण, प्रशिक्षण, स्पेयर पार्ट्स और संचालन खर्च शामिल हैं। तुलना में, भारतीय नौसेना ने पिछले पाँच साल में मात्र 4‑5 बिलियन डॉलर में दो नई शील्ड‑क्लास डेस्ट्रॉयर और एक एंटी‑सबमरीन फ्रिगेट खरीदे। इस प्रकार गारिबाल्डी पर खर्च इंडोनेशिया के समग्र रक्षा बजट का लगभग 12 % तक पहुँच सकता है, जो घरेलू विकासीय जरूरतों के साथ तालमेल बिठाना अब आसान नहीं रहेगा।

भौगोलिक संदर्भ के बिना इस निर्णय को समझना अधूरा रहेगा। इंडोनेशिया, दुनियाभर के सबसे बड़े द्वीप‑समूह वाले राष्ट्र के रूप में, अब दक्षिण‑चीन सागर, अंडमान‑निकोबार और सुलावेशी जल में चीन के बढ़ते नौसैनिक उपस्थिति से अभ्यस्त हो रहा है। भारत, जो द्विपक्षीय समुद्री सहयोग को बढ़ावा दे रहा है, ने कई बार इंडोनेशिया को ‘इंडो‑पैसिफिक’ रणनीति का हिस्सा कहा है। इस तरह की माँग को पूरा करने के लिए एक विमानवाहक का होना भारतीय नौसेना के साथ संयुक्त व्यायाम, मानवीय बचाव मिशन और अतीत में सुदूर‑तालाबंद (high‑seas) सुरक्षा के लिए एक ‘बफ़र’ हो सकता है। लेकिन वास्तविकता में, गारिबाल्डी की क्षमताएँ 1970‑के दशक के डिजाइन पर आधारित हैं; उसका विमान डेक केवल हल्के फिक्स्ड‑विंग या एटीवी‑8 टाइप ड्रोन को ही संभाल सकता है, जबकि आधुनिक ए-ए हवाई प्रभुता या लंबी दूरी के फाल्कन‑type ग्राइंडर्स को वह पनप नहीं सकता।

एक और अहम मुद्दा है ‘ऑपरेशनल रीडीनेस’। नौसैनिक प्रमुख ने कहा है कि पोत का उपयोग ‘गैर‑युद्ध’ मिशनों के लिये होगा, पर इन मिशनों की वास्तविक लागत भी अनदेखी नहीं की जा सकती। मानवीय राहत और एंटी‑पाइरेसी ऑपरेशन में तेल, मालीस, कर्मी, और लॉजिस्टिक सपोर्ट की आवश्यकता होती है, जो अक्सर पोत की आधिकारिक ‘डिस्प्ले‑वर्थ’ से कहीं अधिक खर्चीली होती है। इस बात का भी अभाव है कि इंडोनेशिया के कोर समुद्री शक्ति‑बिंदु – किलियन, अंडोनेसीया और जावानी – में पहले से ही पर्याप्त पोत मौजूद हैं, जिनके लिए आधुनिकीकरण की जरूरत अधिक है, न कि एक पुरानी विमानवाहक को बेकार दिखावा बनाना।

वास्तविकता इस ओर इशारा करती है कि गारिबाल्डी का अधिग्रहण अधिकतर राजनैतिक ‘शो‑केस’ की तरह है। जर्मनी, फ्रांस, जापान और यूएस जैसे बड़े शक्ति‑धारकों के साथ इंडोनेशिया को एक ‘जैबरूम’ में दिखाना, जहाँ वह कूटनीतिक रूप से ‘नौसैनिक दमदार’ दिखा सके, शायद असली मंशा है। यह रणनीति का त्रुटिपूर्ण भाग है: जब तक साधन (हथियार) लक्ष्य (रणनीति) से मेल नहीं खाते, वह केवल एक ‘सजावट’ बन जाता है।

भारतीय पाठकों के लिए यह विकास दो‑तरफ़ा असर रखता है। एक ओर, इंडोनेशिया की समुद्री शक्ति में यह वृद्धि भारत‑इंडो‑फ़्रेंडली समुद्री संयोजन को सुदृढ़ कर सकती है, जिससे भारत‑इंडोनेशिया द्विपक्षीय अभ्यास, अंडमान‑निकोबार में क्रमशः समुद्री निगरानी और अति‑स्थिति में सहयोग संभावित हो सकता है। दूसरी ओर, अगर पोत का वित्तीय बोज़ अत्यधिक हो जाता है तो इंडोनेशिया की आर्थिक स्थिरता, विशेषकर हीट प्रबंधन, बुनियादी ढांचा और सामाजिक विकास को नुकसान पहुंच सकता है – जिससे भारत को अपने पड़ोसी में अस्थिरता के जोखिम को संज्ञान में लेना पड़ेगा।

सारांश में, जहाज़ी ‘गारीबाल्डी’ का इंडोनेशिया में आगमन एक महंगा प्रयोग बनता दिख रहा है। यदि राष्ट्रीय बजट में अधिकतम कटौती न की जाए, तो यह पोत केवल पारदर्शी प्रदर्शन केन्द्र के रूप में ही रहेगा, जबकि वास्तविक समुद्री रक्षा की ज़रूरतें – एएसएआर‑कक्षा के पनडुब्बी, तेज़‑गति‑डेस्ट्रॉयर और नेटवर्क‑सेंटरिक कमांड‑एंड‑कंट्रोल सिस्टम – अभी भी अधूरे हैं। निरंतर बजट निकासी, पुरानी तकनीक और ‘गैर‑युद्ध’ प्रयोगों की सीमित उपयोगिता को देखते हुए, इस ‘खर्चीले दांव’ को केवल एक आँचलिक साहसिक कलाकृति के रूप में देखना बेहतर रहेगा, न कि भारत‑इंडोनेशिया समुद्री साझेदारी की ठोस नींव के रूप में।

Published: May 7, 2026