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अलास्का में दूसरा सबसे बड़ा मेगात्सुनी, छोटे भूकंपों से हुई विशाल स्लाइड
अमेरिकी उत्तरी ध्रुवीय प्रांत अलास्का के टुंड्रा द्वीपसमूह में 12 मार्च 2025 को आए विशाल समुद्री लहर ने इतिहास में केवल एक ही घटना से अधिक, 1958 की लिटुआ बे की 524 मीटर ऊँची लहर, को पीछे छोड़ दिया। स्थानीय जनसंख्या छोटे, परंतु सुदूर क्षेत्र की काबिल‑देहलीज़ पर रह रही थी; फंसे हुए मछुआरों और तेल‑खोज एलायंस को न्यूनतम क्षति हुई, पर जलस्थली‑विज्ञानियों को मिले असामान्य डेटा ने एक बड़ा सवाल उठाया।
वर्ष भर के अवलोकनों के बाद, अमेरिकी भू‑भौतिकी संस्थान (USGS) और यूनिवर्सिटी ऑफ़ वॉशिंगटन की एक टीम ने इस घटना को फिर से जांचा। उनका निष्कर्ष: लहर का मूल कारण दो–तीन माइक्रो‑भूकंप (M2.0‑M2.6) थे, जो 30 सेकंड के अंतराल में ग्रेनाइट‑भरी पहाड़ी पर प्रकट हुए। इन छोटे कंपनों ने पहाड़ी की बर्फ‑आवरण और पेरमाफ्रोस्ट पर दबाव बढ़ा दिया, जिससे 300 मिमी मोटी बर्फ‑और‑चट्टान की एक विशाल स्लाइड समुद्र में धकेल दी गई। यह झटके से उत्पन्न लहर 50 मीटर तक की लहर ऊँचाई तक पहुंची, जिससे इसे अब तक दर्ज दूसरी सबसे बड़ी मेगात्सुनी माना गया।
वैज्ञानिकों का कहना है कि इस प्रकार के माइक्रो‑भूकम्प, जो अक्सर सेंसरों की सीमा से बाहर रह जाते हैं, ग्लेशियर‑हटाने की तेज रफ़्तार और पेरमाफ्रोस्ट के क्षय से जुड़ी हो सकते हैं। वैश्विक रूप से, उत्तर ध्रुवीय इलाकों में बर्फ़ के पिघलने की दर पिछले दो दशकों में दोगुनी हुई है, जिससे समान जोखिम वाले क्षेत्रों में भी दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ रही है। इससे यह स्पष्ट होता है कि अतीत में “भू‑गर्म‑रहित” क्षेत्रों को सुरक्षित मानना अब घटिया अनुमान बन चुका है।
संस्थानिक तौर पर, इस अध्ययन ने अमेरिकी जलवायु‑सुरक्षा एजेंसियों की कमीकदमियों को उजागर किया। चेतावनी नेटवर्क की फंडिंग अक्सर “ब्यूरोक्रेटिक कागज़ी कार्रवाई” के कारण बाधित रहती है; कई महत्वपूर्ण अलास्कन सिस्मिक स्टेशन 2019‑2022 के बीच बंद कर दिए गए थे। परिणामस्वरूप, जब छोटे भूकंप सामने आए, तो रियल‑टाइम डेटा इकट्ठा करना कठिन हो गया। इस विफलता ने न केवल स्थानीय संभावित पीड़ितों को जोखिम में डाला, बल्कि अंतर‑महाद्वीपीय चेतावनी प्रणाली की विश्वसनीयता पर भी धुंधला पर्दा डाल दिया।
इसी संदर्भ में भारत के हित भी जुड़े हैं। भारतीय प्रॉमिनेंट शिपिंग रूट्स, जो एशिया‑पैसिफिक को जोड़ते हैं, अलास्का के निकट स्थित नौटिकल ट्रैफ़िक कॉरिडॉर को छूते हैं। भारत ने 2005 के बाद से इंडो‑पैसिफिक समुद्री चेतावनी नेटवर्क को सशक्त करने के लिए तकनीकी सहयोग प्रदान किया है, लेकिन अभी तक इस सहयोग को अलास्का‑प्रांत के तट‑रॉकेट मॉनिटरिंग में एकीकृत नहीं किया गया है। इस व्यवस्थित अंतर को पाटने के लिए भारत‑अमेरिका वैज्ञानिक मंच (Indo‑US Science & Technology Forum) के माध्यम से एक बहुपक्षीय कार्यशाला का प्रस्ताव रखा गया है।
निष्कर्षतः, अलास्का की यह मेगात्सुनी न केवल प्राकृतिक आपदा की सीमा को फिर से परिभाषित करती है, बल्कि अंतर‑राष्ट्रीय नीति‑निर्माताओं को भी ज़ोरदार रूप से याद दिलाती है कि “छोटे भूकंप बड़े लहरों को जन्म दे सकते हैं” – एक पंक्ति जो विज्ञान के साथ‑साथ कूटनीति और बजट‑निर्णयों में भी गूँजनी चाहिए।
Published: May 6, 2026