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Category: दुनिया

अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने लुइसियाना के रेडिस्ट्रिक्शन को वैध ठहराया, वोटर राइट्स एक्ट की ताकत पर नई चुनौती

जाने-माने अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने 3 मई को लुइसियाना राज्य के नवीनतम निर्वाचन जिले के मानचित्र को स्वीकार कर एक महत्वपूर्ण कानूनी मोड़ तय किया। इसका मतलब यह नहीं है कि अदालत ने अब कोई नया ब्लैक‑बहुसंख्यक जिला बनाना ‘गलत’ ठहराया, बल्कि वह निर्णय जो इस परिवर्तन को वैध मानता है, वह बहुत पहले से बहस में रहे दो प्रमुख मुद्दों को सीधे टकरा देता है: वोटर राइट्स एक्ट (VRA) के सेक्शन‑2 की प्रवर्तनीयता और नस्ल‑आधारित जेरिमैंडरिंग की संवैधानिक सीमा

2020 की जनगणना के बाद लुइसियाना ने एक नया ब्लैक‑बहुसंख्यक कांग्रेस जिला तैयार किया, जिसका लक्ष्य ऐतिहासिक रूप से निराशावादी अल्पसंख्यक वोटरों को राजनीतिक शक्ति देना था। संघीय विभाग ऑफ़ जस्टिस ने इस योजना को सेक्शन‑2 के तहत ‘संकटग्रस्त’ माना, और मान्यता दी कि यदि यह नहीं बनाया गया तो काले मतदाताओं को समान प्रतिनिधित्व नहीं मिलेगा। हालाँकि, कई प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि ऐसा जिला आकार‑भेद की ओर ले जाता है, जो अब तक न्यायालयों द्वारा सीमित किया गया है।

अदालत ने अंततः स्पष्ट किया कि सेक्शन‑2 के तहत “ब्याज‑भेद” की आवश्यकता केवल तभी उत्पन्न होती है जब राज्य विकल्प‑सुलभ वैकल्पिक योजना प्रस्ताव कर सके, जो समान ‘प्रतिनिधित्व’ प्रदान करे। क्योंकि लुइसियाना की प्रस्तावित वैकल्पिक मानचित्रें ‘रुचिकर’ नहीं थीं, न्यायालय ने इस बात को स्वीकार किया कि राज्य अपने अंतर्विभाजन को इस तरह से नहीं बदल सकता जो अल्पसंख्यक मतदाताओं को वंचित करे। इस निर्णय ने सिद्धान्त में मतदान अधिकार अधिनियम को ‘जैसे का तैसा’ रहने दिया, पर व्यावहारिक रूप से उसकी प्रवर्तन शक्ति को बहुत कम कर दिया।

वहीं, यह फैसला दो दशकों के बाद उच्च न्यायालय की यह दलील को फिर से जगा रहा है कि नस्ल‑आधारित जेरिमैंडरिंग को संविधान के समान संरक्षण के तहत आंका नहीं जाना चाहिए। Rucho v. Common Cause (2019) में न्यायालय ने पार्टियों के बीच गढ़ी गई सीमाओं को ‘राजनीतिक प्रश्न’ घोषित किया था, और अब यह लहर VRA के अनुच्छेद‑2 पर भी समान रूप से लागू हो रही है। परिणामस्वरूप, जिन राज्यों ने 2020‑2022 के री-ड्राफ्टिंग‑चक्र में अल्पसंख्यकों को प्रमुखता देने के लिए कूटनीतिक ‘बजाए गए’ जिलों को तैयार किया था, वे अब अनिश्चितता के चक्र में फंस सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से यह परिदृश्य भारतीय पाठकों को अजीब नहीं लगेगा। भारत में 2002‑2008 की ‘डेलीमिटेशन’ प्रक्रियाएँ भी अक्सर सामाजिक‑धार्मिक अल्पसंख्यकों को ‘सुरक्षित’ करने के इरादे से प्रेरित रही हैं, पर कभी‑कभी अति‑संतुलन की ओर धकेलती रही हैं। लुइसियाना का मामला दिखाता है कि जब न्यायिक समीक्षा ‘जटिल सामाजिक समीकरणों’ को सरलीकृत करती है, तो न केवल नीति‑निर्माताओं बल्कि सामान्य जनता को भी ‘समीकरणीय’ परिणामों का सामना करना पड़ता है।

आलोचनात्मक दृष्टिकोण से कहा जाए तो सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला ‘वैधता’ का एक सूक्ष्म ढांचा प्रस्तुत करता है, जहाँ नस्ल‑आधारित संरक्षण और चुनावी समानता के बीच झूलते‑झूलते न्यायपालिका खुद को ‘संतुलन कलाकार’ बना बैठी है। असली प्रश्न यह नहीं कि अदालत ने क्या कहा, बल्कि यह है कि इस प्रकार का ‘कानूनी तिरछा’ भविष्य में अल्पसंख्यक अधिकारों को कैसे आकार देगा। अगर दावों में काया नहीं, तो ‘वॉटरिंग‑होल’ सिद्धान्त (जहाँ छोटे‑छोटे सुधार बिंदु-व्यक्ति के अधिकारों को धीरे‑धीरे खा लेते हैं) फिर से फलीभूत हो सकता है।

सारतः, लुइसियाना में बने नए ब्लैक‑बहुसंख्यक जिले को सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी तौर पर मान्य किया, पर इस मान्यता ने वोटर राइट्स एक्ट के आश्चर्यजनक प्रयोग को क्षुद्र बना दिया है। यह न केवल अमेरिकी नृशासन के भविष्य को फिर से लिखता है, बल्कि विश्वभर में समान अधिकार‑सम्बंधी बहसों को नया स्वर देता है—एक स्वर जिसमें भारत जैसी लोकतांत्रिक प्रणाली भी अपना हाथ मतवाने को तैयार रख सके।

Published: May 4, 2026