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Category: दुनिया

अमेरिका बनाम लैटिन अमेरिका: सैन्य‑उद्योग की मशीन और ग्लोबल साउथ की संप्रभुता पर सवाल

अमेरिका के सैन्य‑उद्योग ने 2025‑26 के दौरान लैटिन अमेरिका में अपनी जड़ें गहरी कर ली हैं, चाहे वह कोलंबिया को नए युद्धक विमान की आपूर्ति हो या ब्राज़ील के साथ रक्षा सहयोग का नया समझौता। इन कदमों का उद्देश्य स्पष्ट है – क्षेत्रीय सुरक्षा के नाम पर अमेरिकी रणनीतिक शक्ति को मजबूत करना, जबकि स्थानीय लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को ‘सुरक्षा कारणों’ से टेढ़ा‑मेढ़ा किया जाता है।

विद्वान वर्शा गांडीकोटा ने इस पर सवाल उठाते हुए सुज़ाना मुहामद से पूछा: “सैन्य‑उद्योग की इस मशीन का ग्लोबल साउथ की संप्रभुता पर क्या असली असर है?” मुहामद, जो कोलंबिया की सुरक्षा नीति पर लंबे समय से अनुसंधान करती हैं, का उत्तर तुच्छ नहीं था। उन्होंने बताया कि निरंतर हथियारों की डिलीवरी, संयुक्त प्रशिक्षण कार्यक्रम और “डेमोक्रेसी‑एडवांस्ड” वॉरगेम्स के माध्यम से स्थानीय सरकारें अक्सर अपने बजट का बड़ा हिस्सा सैन्य खर्च में मोड़ रही हैं, जिससे सामाजिक विकास के लिए बची हुई निधि घटती जा रही है।

सही कहा, यह सिर्फ लैटिन अमेरिकी समस्या नहीं है। भारत भी दीर्घकालिक सैन्य‑उद्योग के बुलबुले से बचते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को महत्व देता आया है। हाल ही में दिल्ली‑बुजेरो पेरो आर्थिक फोरम में भारत ने कहा कि वह ‘वायर्ड इकोनॉमी’ और ‘स्वदेशी रक्षा उत्पादन’ को बढ़ावा दे रहा है, ताकि बाहरी शक्ति के दबाव में न फँसे। इस प्रकार, अमेरिकी नीति की एक नज़र में प्यारी‑प्यारी “साझेदारी” भारतीय रणनीति के लिए एक सतही चेतावनी बन गई है।

पिछले दो वर्षों में, यू.एस. ने लैटिन अमेरिकी देशों को 2 बिलियन डॉलर से अधिक के हथियारों के पैकेज प्रदान किए। इसी के साथ, क्षेत्र में अमेरिकी निजी सुरक्षा कंपनियों ने “रिपोर्टेड मिलिट्री एक्टिविटी” की श्रेणी में 30% की वृद्धि दर्ज की। इस आँकड़े का मतलब कुछ भी हो सकता है, पर एक बात तो तय है: पेशेवर युद्ध मशीनरी को लैटिन अमेरिकी धरती पर उतारने से स्थानीय जनसंख्या की असुरक्षा तो बढ़ेगी ही, साथ ही जमीनी स्तर पर ‘संप्रभुता’ का अर्थ भी धुंधला होगा।

संसदीय प्रवर्तकों और इन्फॉर्मेटिक विशेषज्ञों ने इस पर “नीति‑घोषणाओं और वास्तविक परिणामों के बीच का अंतराल” को ‘भारी‑वजनदार मोर’ कहा। बीते 12 महीनों में, कई राष्ट्रों ने अमेरिकी सुरक्षा निहितार्थों को लेकर अपना “विचार‑विमर्श” सार्वजनिक किया, परन्तु दबाव के आगे अक्सर “इंटीग्रेटेड डिफेंस” के नाम पर समझौते पर हस्ताक्षर ही कर लेते हैं। यह अभिप्राय है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर “सुरक्षा” शब्द का प्रयोग अब एक राजनीतिक रॉड है, जिसका सिरा आम जनता की मूलभूत जरूरतों से दूर बिचलित हो चुका है।

निष्कर्षतः, वर्शा गांडीकोटा‑सुज़ाना मुहामद की चर्चा यह दर्शाती है कि अमेरिकी सैन्य‑उद्योग केवल एक व्यापारिक मॉडल नहीं, बल्कि एक नीति‑विधि उपकरण है जो ग्लोबल साउथ की संप्रभुता को लगातार चपटा कर रहा है। भारत के लिए यह एक सीख बनती है: अपनी रक्षा उत्पादन को आत्मनिर्भर बनाकर, बहुपक्षीय मंचों पर ‘समझौता राजनीति’ की जगह ‘सच्ची स्वायत्तता’ को प्राथमिकता देनी चाहिए। यही वैसा ‘सूखा व्यंग्य’ है जो अंतरराष्ट्रीय शक्ति‑संरचनाओं को उनके वास्तविक प्रतिबिंब में देखना सिखाता है – एक तेज़ धूप में पिघलते चश्मे जैसा, जो दिखाता है कि अधिक शक्ति अक्सर कम समझ की ओर ले जाती है।

Published: May 3, 2026