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अमेरिका का होर्मुज ऑपरेशन दो दिन में रोक: ट्रम्प की अस्थिर विदेश नीति पर सवाल
संयुक्त राज्य अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 4 मई को स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज में समुद्री जहाज़ों की सुरक्षित पारगमन के लिए एक सैन्य ऑपरेशन की घोषणा की। लेकिन घोषणा के केवल 50 घंटे बाद, उसी दिन रात में, इस योजना को आधिकारिक तौर पर रोक दिया गया। दो दिनों में ही इस तरह की उलटफेर ने अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, तेल बाजार और भारत जैसे देशों के रणनीतिक हितों में नई लहरें खड़ी कर दीं।
हॉर्मुज जलमार्ग विश्व के सबसे रणनीतिक संकीर्ण जल-राहों में से एक है। इस रास्ते से प्रतिदिन सूअरते 20‑20 प्रतिशत वैश्विक तेल और कई मिलियन बैरल गैस निकलते हैं। भारत, जो अपनी अधिकांश ऊर्जा आयातित तेल को यहाँ से लेकर अपने द्वार तक ले जाता है, इस कड़ी पर हमेशा सतर्क रहता है। इसलिए इस जलमार्ग में किसी भी प्रकार की अनिश्चितता भारतीय तेल कीमतों, नौसैनिक तैनाती और ऊर्जा सुरक्षा को सीधे प्रभावित करती है।
ऑपरेशन का मूल कारण इरान के साथ बढ़ते तनाव को लेकर था। वाशिंगटन ने इरानी टैंकरों पर लगाए गए प्रतिबंधों के जवाब में, और सऊदी अरब के साथ ऊर्जा निर्यात को सुरक्षित रखने के इरादे से, हॉर्मुज में अमेरिकी जहाजों की उपस्थिति को मजबूत करने का इरादा बताया। लेकिन दो दिन बाद ही, अमेरिकी प्रशासन ने ऑपरेशन को रोकने का फैसला किया, जिससे यह सवाल उठता है कि क्या यह घोषणा केवल दिखावे के लिए थी?
संयोजित राष्ट्र, यूरोपीय संघ और चीन ने इस मोर्चे पर तुरंत चिंता जताई। उन्होंने सर्वसम्मत रूप से कहा कि किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई समुद्री व्यापार में व्यवधान उत्पन्न कर सकती है और विश्व तेल की कीमतों को अस्थिर कर सकती है। इस दबाव के साथ-साथ, अमेरिकी द्वीप-समूह में अनिच्छित चीन के आर्थिक टकराव के बारे में भी चुप नहीं किया गया। वास्तव में, ट्रम्प के हॉर्मुज प्रोजेक्ट ने अंतरराष्ट्रीय नीति निर्माण में बैक-चैनल वार्तालापों को नज़रअंदाज़ करने के राजनयिक भ्रम को उजागर किया।
इसी बीच, भारतीय विदेश मंत्रालय ने तटस्थता की मांग की, साथ ही इरान के प्रति “सावधानीपूर्वक संवाद” की आवश्यकता पर बल दिया। इससे स्पष्ट हो जाता है कि भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता नहीं केवल इरानी धमकी है, बल्कि अमेरिकी “सुरक्षा का इशारा” है, जो वार्तालाप को अस्थिर करके क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को झुका सकता है। भारतीय नौसेना ने भी इस बिंदु पर अपनी तैनाती को पुनः समीक्षा किया, क्योंकि समुद्री शर्तों में अचानक बदलाव एक ही समय में दो हीरो-मेंटन को जन्मत में लाता है – एक तरफ अमेरिकी ‘डिटर्मिनेशन’ का जलावा, और दूसरी तरफ भारतीय ‘स्थिरता’ की जरूरत।
संक्षेप में, ट्रम्प प्रशासन की दो-दिनीय योजना रद्दीकरण ने कई बिंदुओं को उजागर किया: एक ओर यह दिखाता है कि अमेरिका अभी भी मध्य-पूर्व में “बड़े दांव” खेलने के लिए तैयार है, पर दूसरी ओर वह अपने ही चुनावी-तत्वीय पदचिह्न से बंधा है। इस प्रकार निरंतर दिखावे और वास्तविक कूटनीति के बीच की दूरी को मात्र हवाई मार में नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा बाजारों में “ज्यादा देर तक नहीं” मापी जा सकती। भारतीय पाठकों के लिए इसका अर्थ यह है कि विदेशी शक्ति-प्रदर्शन पर निर्भरता वाले देशों को अपनी ऊर्जा सुरक्षा का “बहुस्तरीय” ढांचा तैयार करना अनिवार्य है, न कि केवल अंतरराष्ट्रीय शोर-गुल के अनुरूप फेंक देना।
अंततः, हॉर्मुज का साफ़-सा पानी अभी भी बह रहा है, लेकिन उसकी गहराइयों में मौजूदा शक्ति-संरचनाओं की लहरें हमेशा के लिए नहीं रुकेंगी। ट्रम्प का “पॉज़” शायद अस्थायी राहत हो, लेकिन यह सवाल कि इस तरह की नीति में स्थिरता कब आएगी, अब भी कूटनीतिक मंच पर लटका हुआ है।
Published: May 6, 2026