अमेरिका का ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’: हुर्मुज में सुरक्षित नौवहन और इरान पर नौसैनिक नाकाबंदी को प्राथमिकता
संयुक्त राज्य की सेंट्रल कमांड (CENTCOM) ने हाल ही में ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ नामक ऑपरेशन की रूपरेखा पेश की, जिसमें फारस की जलधारा, हुर्मुज जलडमरूमध्य, को सुरक्षित मार्ग में बदलना और इरान के समुद्री गतिविधियों को सीमित करना मुख्य उद्देश्य बताया गया। इस पर सियोल में स्थित CENTCOM के प्रवक्ता टिम हॉकिन्स ने कहा कि यह ‘सुरक्षित रास्ता’ अमेरिकी रणनीति का शीर्ष प्राथमिकता है।
हुर्मुज केवल 40 किलोमीटर चौड़ा जलडमरूमध्य नहीं है; यह विश्व ऊर्जा की रीढ़ का एक प्रमुख घटक है, जहाँ से प्रतिदिन लगभग 20 % वैश्विक पेट्रोलियम प्रवाहित होता है। इस कारण यह क्षेत्र हमेशा भू‑राजनीतिक जटिलताओं का केंद्र रहा है। अब अमेरिकी नौसैनिक बलों को ‘सुरक्षित मार्ग’ और साथ ही इरानी जहाजों पर ‘नौसैनिक नाकाबंदी’ दोनों की जिम्मेदारी सौंपना एक दोधारी तलवार जैसा प्रतीत होता है—एक ओर तेल की आपूर्ति को जारी रखने की बात, तो दूसरी ओर इरान को आर्थिक दबाव के लिये समुद्री बंदी बनाना।
यह बयान अंतरराष्ट्रीय मंच पर क्लासिक अमेरिकी द्वैतवादी नीति को दोहराता है: ‘स्वतंत्रता’ के नाम पर शक्ति का प्रयोग, जबकि वही शक्ति अक्सर संकीर्ण आर्थिक हितों की रक्षा में ही व्याख्यायित होती है। अभ्यस्त सुरक्षा विशेषज्ञ टिप्पणी करते हैं कि अगर नाकाबंदी के ‘साफ़‑सफ़ाई’ के रूप में आर्थिक प्रतिबंध और जहाज़ों की जाँच‑परख का प्रयोग किया गया, तो वास्तव में वह ‘स्वतंत्रता’ सिर्फ एक कागज़ की परत रह जाएगी।
भारत के लिए इस दबाव का असर दोहरे अर्थों में मिला-जुला है। देश विश्व के सबसे बड़े तेल आयातकों में से एक है, जिसमें मध्य-पूर्व से आयातित कच्चे तेल का अनुपात लगभग 80 % है। हुर्मुज से होने वाले किसी भी व्यवधान से भारतीय रिफ़ाइनरियों को वैकल्पिक मार्ग, जैसे ओमान‑अफ़ग़ानिस्तान‑तेज दरी, या अफ्रीकी घाटी के बंदरगाहों पर निर्भर होना पड़ेगा—और वह भी महंगे खर्च पर। दूसरी ओर, भारत ने हाल के वर्षों में इरान के बंदरगाह चाबहार में रेल‑समुद्री कनेक्शन को बढ़ावा दिया है, जिससे ऊर्जा सुरक्षा को ‘बहु‑धारावी’ बनाने की कोशिश की गई है। लेकिन अमेरिका की नाकाबंदी नीति यह सवाल उठाती है कि क्या भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को ‘बहु‑धारा’ की नीति के झूठे वादे में कुचल देगा।
वैश्विक स्तर पर यह कदम पहले से ही कई ठंडी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न कर चुका है। यूरोपीय संघ ने ‘सुरक्षित नौवहन’ की बात पर सहमति जताई, पर इरान पर नाकाबंदी को ‘उग्रता बढ़ाने वाला’ कहा। रुस‑इरान संबंधों को देखते हुए, संभावित सहयोगी दो ओर से भी जवाबी उपायों की तैयारी की जा रही है—जिसमें दक्षिण‑एशिया के समुद्री द्रव्यमान में वृद्धि या ‘गुप्त‑मार्गों’ का उपयोग भी शामिल हो सकता है।
सारांशतः, ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ एक स्पष्ट संकेत है कि अमेरिकी विदेश नीति अभी भी ‘समुद्र में हाथ दिखाना’ को प्राथमिकता देती है, जबकि उसी हाथ से वह वैश्विक बाजारों के रक्षक के रूप में खुद को स्थापित करने की कोशिश करती है। इस द्वंद्व में अंतरराष्ट्रीय समुदाय, विशेषकर भारत, को अब न केवल तेल की आपूर्ति की स्थिरता, बल्कि समुद्री शक्ति के ‘सुरक्षित रास्ते’ को परिभाषित करने वाले नियम‑पुस्तकों के पुनःमूल्यांकन के लिये तैयार रहना पड़ेगा।
Published: May 6, 2026