जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: दुनिया

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

अमेरिका की नई आतंकवाद‑रोध नीति ने यूरोप को ‘इन्क्यूबेटर’ घोषित किया, भारत के लिए द्विधा

वॉशिंगटन ने बुधवार को 16 पृष्ठों की एक रिपोर्ट के तहत अपनी नई आतंकवाद‑रोध रणनीति पेश की, जिसमें यूरोप को "मास माइग्रेशन से पोषित आतंकवाद का इन्क्यूबेटर" कहा गया। इस दस्तावेज़ के प्रमुख लेखक सेबॅस्टियन गोरका हैं, जो पिछले प्रशासन के सबसे बेफिकीर ट्रम्प‑सहयोगियों में से एक माने जाते हैं। गोरका की टीम ने अमेरिकी विरोधियों को टैग‑टैग करने की परम्परा को तेज़ किया, इस बार "हिंसक वामपंथी उग्रवादी" और "कट्टर‑ट्रांसजेंडर" समूहों को भी लक्ष्य बनाया।

ध्यान के केंद्र में, जैसा कि रिपोर्ट में स्पष्ट है, अमेरिका के अमेरीका महाद्वीप में स्थित ड्रग कार्टेल्स को नयी सैन्य‑आर्थिक टूल्स के साथ कुचलने की योजना है। इस प्रकार, यूरोप को इन्क्यूबेटर मानते हुए, ब्राज़ील, मेक्सिको और कोलंबिया जैसी लैटिन अमेरिकी स्रीष्‍टियों को प्राथमिकता दी गई है। यह दिशा‑परिवर्तन अस्थिरता की सच्ची “ग्लोबल थ्रेट” की फिराक से नहीं, बल्कि घरेलू वामपंथी विरोधी लकीर को उजागर करने के लिए है।

पिछले दो दशकों में यूरोप ने शरणार्थियों की एक विशाल लहर देखी, जिसमें कई मध्य‑पूर्वी और अफ्रीकी देशों को अस्थायी आश्रय मिला। उन्होंने किनारे पर फांसाने वाले होते हुए भी, युरोपीय राजनयिक प्रजासत्ताकों को व्यापक रूप से अनजाने में कुछ “गैर‑राष्ट्रवादी” नेटवर्क के साथ गठबंधन माना गया। संयुक्त राज्य ने इसे राजनीतिक रूप से प्रयोग किया, जैसे वह अक्सर कूटनीतिक कार्बन को धुएँ में बदल देता है, जबकि वास्तविक सुरक्षा खतरे को नज़रअंदाज़ करता है।

भारत के लिए इस बयान का क्या मतलब है? भारत-यूरोप साझेदारी, विशेषकर साइबर‑सुरक्षा और मादक‑सामान प्रवर्तन में, काफी हद तक अमेरिकी भरोसे पर आधारित रही है। यदि वॉशिंगटन यूरोपीय सहयोगियों को "असुरक्षित" के रूप में चिह्नित करता है, तो यह दो‑पैटर्न के दांव को बदल सकता है। विशेषकर जब भारत अपने स्वयं के प्रवासन‑संबंधी चुनौतियों—बांग्लादेश, मीठी तलवार‑हिंसा, और अफगान शरणार्थियों—से जूझ रहा है, तो यूरोपीय देशों की नीति‑समीक्षा भारत द्वारा अपनाए गए “विदेशी‑सुरक्षा” के समीकरण में नई शर्तें जोड़ सकती है।

अभियोजन के परिप्रेक्ष्य में नज़र डालें तो, इस रणनीति की “एक्टिव” पैराग्राफ़ लगभग एक अंतर‑संघीय रूब्रीक्या के समान है: “सभी हिंसक वामपंथियों को, चाहे वे ट्रांसजेंडर समर्थन के लिए हों या सामाजिक न्याय के झंडे की बोली हों, आतंकवादी मानें।” यह शब्दावली न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मूलभूत सिद्धांत को कुचलती है, बल्कि उन लोकतांत्रिक देशों के भीतर वैध विरोध को भी दमन करती है, जिनसे अमेरिकी नीति को वैधता मिलती है।

संक्षेप में, अमेरिकी नई रिपोर्ट दो‑विधीय लक्ष्य रखती है: लैटिन अमेरिकी ड्रग‑कार्टेल को “वैश्विक खतरा” कहकर सैन्य‑नीतियों को औचित्य देना, और यूरोप को “इन्क्यूबेटर” घोषित करके घरेलू राजनैतिक प्रतिद्वंद्वियों को निशाना बनाना। भारत को इस द्वंद्व में बारीकी से चलना होगा—कुश्ती में झुकाव न दिखाते हुए, लेकिन सहयोगियों के साथ रणनीतिक समानार्थी बनते हुए। जैसे ही टाइमर धड़कता है, नज़र रखी जानी चाहिए कि क्या यह अमेरिका‑यूरोप‑भारत त्रिकोणीय तालमेल को ‘कट्टर‑ट्रांसजेंडर‑इंक्यूबेटर‑ड्रग‑कार्टेल’ के शब्दजाल में बदल देगा।

Published: May 7, 2026