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Category: दुनिया

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अमेज़ॅन के विनाश का जोखिम और संरक्षण का लाभ: नवीन अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष

एक अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक समूह ने हाल ही में एक व्यापक मॉडल‑आधारित विश्लेषण प्रस्तुत किया, जिसमें अमेज़ॅन में पेड़‑कटाई और वैश्विक तापवृद्धि के सम्मिलित प्रभावों को जोड़ा गया है। परिणाम दर्शाते हैं कि यदि वर्तमान रफ़्तार जारी रहती है, तो इस वर्ष के मध्य तक पूरे बायोम में व्यवस्थित पतन की सम्भावना लगभग जुड़ाव बिंदु (टिपिंग पॉइंट) के निकट पहुँच जाएगी। इस भौगोलिक क्षेत्र का पतन सिर्फ दक्षिण‑अमेरिकी जलवायुगत स्थायित्व को ही खतरे में नहीं डालता, बल्कि सुदूर भारत के मानसून प्रणाली पर भी नकारात्मक प्रतिध्वनि पैदा कर सकता है, क्योंकि अमेज़ॅन से क्षतिग्रस्त माहौल में जलवाष्प के प्रवाह में उल्लेखनीय कमी आती है।

अध्ययन ने दो मुख्य परिदृश्यों को परखी: निरंतर कटाई‑आधारित "बिजनेस ऐज़ यूसुअल" और सक्रिय संरक्षण‑आधारित "प्रोटेक्ट एंड थ्राइव"। बिजनेस ऐज़ यूसुअल में 2032 तक वन-क्षेत्र का 45 % घटने की संभावना बताई गई है, जिससे जैव विविधता के साथ‑साथ प्रति वर्ष लगभग 0.8 गिगा टन कार्बन डाइऑक्साइड का निर्याण होगा। इसके विपरीत, संरक्षण परिदृश्य में प्रतिबंधित क्षेत्रों में 70 % तक पुनःवनरोपन को प्रोत्साहित करने से 2030 तक ही लगभग 1.2 गिगा टन CO₂ का अवशोषण संभव है, जिसका तुलनात्मक मूल्य विश्व के कुल उत्सर्जन में लगभग 3 % है।

इन आँकड़ों को देखना तो बहुत ही वैज्ञानिक लग सकता है, परन्तु यहाँ सत्ता‑संरचनाओं की दोहरी कहानी स्पष्ट हो जाती है। ब्राज़ील में वर्तमान सरकार ने 2024 से "आर्थिक विकास के लिए वन‑कटाई" को प्राथमिकता देने वाले कई प्रोत्साहन पैकेज लागू किए, जबकि अंतरराष्ट्रीय पूर्वाधार निधियों ने समान वर्ष में संरक्षण‑प्रोजेक्ट्स को धूमिल कर दिया। परिणामस्वरूप, पेड़‑कटाई करने वाले कंपनियों को मिलियन‑डॉलर की रियायती कर छूट मिलती है, जबकि वही कंपनियां जलवायु‑संधियों के तहत वादे किए गए कार्बन‑क्रेडिट मिलने से वंचित रहती हैं।

इन नीतिगत विरोधाभासों पर ध्यान देना आवश्यक है, क्योंकि भारत जैसी कई विकसित‑उभरती अर्थव्यवस्थाएँ अमेज़ॅन से सोयाबीन, बीफ़ और लकड़ी के आयात पर काफी निर्भर हैं। यदि अमेज़ॅन का पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ता रहा, तो इन वस्तुओं की कीमत में उछाल के साथ ही कृषि‑उत्पादन‑शृंखलाओं में व्यवधान उत्पन्न हो सकता है, जिससे भारत के खाद्य‑सुरक्षा पर अप्रत्यक्ष दबाव बढ़ेगा। वहीं, संरक्षण के तहत निर्मित कार्बन‑क्रेडिट भारत के मौजूदा उत्सर्जन‑ट्रेडिंग मैकेनिज़्म में एक वैकल्पिक स्रोत बन सकता है, यदि अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ट्रैकिंग एवं वैरिफिकेशन प्रणाली स्थापित हो।

भौगोलिक स्थायित्व की इस टक्कर में वैश्विक नीति‑निर्माताओं का "नया शब्द" स्पष्ट है: पारिस्थितिक ट्री‑हाउस। यही शब्दावली अक्सर अंतरराष्ट्रीय जलवायु सम्मेलनों में बकवास के रूप में सुनाई देती है, जहाँ अमेज़ॅन को "विश्व के फेफड़े" के रूप में सम्मानित किया जाता है, पर वास्तविक जमीन पर पेड़‑कटाई के लिए नई लाइसेंस जारी किए जाते हैं। इस दोहरी मानदंडता की तुलना, शायद, उस शहरी योजना से की जा सकती है जहाँ सबको तीक्ष्ण पहाड़ी पर "स्काईलाइन" बनाने का अधिकार तो दिया जाता है, पर नीचे की ज़मीनी अंकरूपता को नज़रअंदाज़ किया जाता है।

संक्षेप में, अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि अमेज़ॅन का भविष्य केवल ब्राज़ील या पेरू के राष्ट्रीय नीतियों पर नहीं, बल्कि वैश्विक बाजार की माँग, कार्बन‑क्रेडिट की सच्ची वैधता, और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय प्रवाह के दिशा‑निर्देशों पर निर्भर है। अगर संरक्षण‑आधारित मॉडल को वास्तविक बजट एवं क़ानूनी समर्थन मिले, तो न केवल पर्यावरणीय संतुलन बरकरार रहेगा, बल्कि भारत जैसे दूरस्थ राष्ट्र भी जलवायु‑सुरक्षा की चक्रव्यूह में एक छोटा लेकिन निरर्थक चक्र पूरा कर सकते हैं।

Published: May 7, 2026