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Category: दुनिया

अफ़्रीकी सैनिकों की रूस‑यूक्रेन संघर्ष में भागीदारी: आर्थिक मजबूरियां और मॉस्को की भर्ती नीति

रूस‑यूक्रेन युद्ध ने एक अनपेक्षित आयाम ले लिया है: अफ्रीकी देशों के युवा अब रूसी स्कूलों के आधे रास्ते में लड़ाई के मैदान में मौजूद हैं। इस प्रवृत्ति के दो स्पष्ट आधार हैं – मॉस्को की निरंतर्यतित मानवशक्ति की कमी और अफ्रीकी महाद्वीप में युवा वर्ग की संवेदनशील बेरोज़गारी।

रूस ने 2022 में अपनी पहली बड़ी सैन्य विफलता के बाद “सैन्य बल बढ़ाओ” नीति अपनाई। अपनी सीमित जनसंख्या और पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण, रूसी कमान ने विदेशी भर्तियों पर, विशेषकर अफ्रीकी महाद्वीप, आयु वर्ग के 18‑30 वर्षों के युवाओं पर, घातक भरोसा किया। वाग्नर समूह, काली द्वीप पर स्थापित निजी सैन्य कंपनियों, ने स्थानीय राजनैतिक जुड़ावों का फायदा उठाते हुए उन देशों में भर्ती कैंपें स्थापित कर लीं जहाँ रोजगार के अवसर कम हैं।

इसी बीच कई अफ्रीकी देशों में आर्थिक स्थिति बिगड़ती जा रही है। तेल, खनिज और कृषि निर्यात में गिरावट, साथ ही वैश्विक महंगाई ने युवा वर्ग को नौकरी से वंचित कर दिया। परिणामस्वरूप, लगभग 12,000 अफ्रीकी लड़के, जिनमें सुदान, घाना, नाइजीरिया और कांगो के लोग प्रमुख हैं, ने रूसी सैना में शामिल होने के लिये दस्तक दी। “संघर्ष के मैदान में सैलरी मिलती है, घर में भोजन नहीं मिलता” जैसी कहानियां स्थानीय मीडिया में दोहराई जा रही हैं।

भर्ती प्रक्रिया में अफ्रीकी सरकारों की भागीदारी अक्सर नज़रअंदाज़ की जाती है। कुछ राष्ट्रों ने अचल रूप से भर्ती को रोका, परंतु जाँच के अनुसार कई अफ्रीकी सुरक्षा एजेंसियों ने विदेशी मौद्रिक बहिर्वाह को रोकने के लिये आवश्यक निगरानी नहीं की। यह “अराजक” नियामक ढांचा निश्चित ही अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप नहीं है, और इससे मॉस्को को “भाड़े के सैनिक” की लहर को स्थिरता से टोकन करने में मदद मिलती है।

वहीं, भारत के लिए यह बुनियादी श्रोतों और रणनीतिक हितों से जुड़ी एक चेतावनी है। भारत, अपनी बढ़ती AFRICOM-सम्बन्धी सहयोग और अफ्रीका में बुनियादी ढाँचा निवेश के जरिए, इस महाद्वीप में आर्थिक अवसर देख रहा है। यदि अफ्रीका में अस्थिरता बढ़ती रही, तो भारतीय कंपनियों के निवेश पर असर पड़ेगा। साथ ही, भारत की तकनीकी सहायता और शैक्षणिक सहयोग भी संभावित रूप से रोजगार सृजन में योगदान दे सकता है—यदि इसे सही ढंग से प्रदाय किया जाये।

भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में देखे तो, विदेशी सैनिकों को युद्ध में शामिल करना रूस की “सैन्य‑सॉफ्ट पावर” को आराम देता है, परन्तु यह नीति दीर्घकालिक रणनीतिक समस्याओं को जन्म देती है। विदेशी भर्तियों की उच्च मृत्यु दर, सामाजिक पुनर्वास की कमी, और संभावित युद्ध‑बाद के पुनरुवास मुद्दे, सभी मिलकर रूस के अंतरराष्ट्रीय छवि को और धुंधला कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त, अफ्रीकी देशों में इस तरह के “भारी‑भाड़े” का प्रचलन स्थानीय जातीय संघर्षों को भी प्रज्वलित कर सकता है।

निष्कर्षतः, अफ्रीकी युवाओं की रूसी सेना में भागीदारी केवल आर्थिक निराशा और रूस की सैन्य आपूर्ति की अस्थिरता का साक्षी नहीं, बल्कि यह एक जटिल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की त्रुटि भी दर्शाती है। भारत के लिये यह समय है कि वह अफ्रीकी आर्थिक सहयोग को सुदृढ़ करे, साथ ही रूस‑अफ्रीका को उजागर करने वाली नीतियों की गहरी जाँच करे, ताकि भविष्य में ऐसे परस्पर‑दुर्भाग्यपूर्ण गठजोड़ों से बचा जा सके।

Published: May 4, 2026