NATO प्रमुख ने कहा यूरोपियों ने ट्रम्प के रक्षा संदेश को समझ लिया — अमेरिका‑इज़राइल‑ईरान संघर्ष में सहयोग पर तनाव
जेंस स्टोल्टेनबर्ग, NATO के महासचिव, ने बुधवार को इस बात पर ज़ोर दिया कि यूरोपीय देशों ने अब अमेरिकी रक्षात्मक एजेंडा को गंभीरता से लेने की चेतावनी को समझ लिया है। यह टिप्पणी तब सामने आई जब अमेरिकी राष्ट्रपति, जिन्होंने हाल ही में इज़राइल‑ईरान में बढ़ती जंग को लेकर कई यूरोपीय सहयोगियों पर पर्याप्त समर्थन नहीं देने का आरोप लगाया, कूटनीतिक टोन को पतला करते दिखे।
राष्ट्रपति का आरोप यह था कि कुछ NATO सदस्य, विशेषकर पश्चिमी यूरोपीय गठबंधन, अमेरिकी‑इज़राइली सैन्य कारवाइयों में राहत प्रदान करने में ‘अपर्याप्त’ कदम उठा रहे हैं। उनका इशारा इज़राइल‑ईरान संघर्ष के तख्तापलट के जोखिम को लेकर था, जहाँ अमेरिकी मानचित्र पर अब इज़राइल की सुरक्षा को प्राथमिकता दी गई है। इस बीच, यूरोपीय यूनियन के कई देश अभी भी ‘रक्षा खर्च 2% जीडीपी’ लक्ष्य को पूरा करने में संघर्ष कर रहे हैं, जिससे दोनों प्रशासनों के बीच नीतिगत दूरी स्पष्ट हो रही है।
स्टोल्टेनबर्ग के बयान के पीछे एक रणनीतिक संकेत छुपा है: यूरोपीय राजनयिक अब अपने रक्षा बजट को बढ़ाने के लिए अमेरिकी दाब को ‘सुन' रहे हैं, जबकि वही दाब उसी समय पश्चिमी सहयोगियों पर ‘संकट के समय समर्थन में कमियों' का आरोप लगा रहा है। यह दोहरा मानक NATO के भीतर अंतःसंधि को कमजोर कर सकता है, खासकर जब गठबंधन को बलेस्टिक क्षमताओं, साइबर संरक्षण और यूक्रेन‑रूस जाँच की आवश्यकता है।
भारत के लिए इस विकास के प्रतिफल सीधे नहीं हैं, पर अप्रत्यक्ष प्रभाव स्पष्ट है। 2024‑25 में भारत ने कई यूरोपीय रक्षा कंपनियों के साथ संयुक्त प्रोजेक्ट्स को बढ़ाया था, और अब यूरोप की रक्षा खर्च में संभावित वृद्धि अमेरिकी हथियार प्रणालियों के निर्यात को भी प्रोत्साहित कर सकती है। साथ ही, इज़राइल‑ईरान की अस्थिरता मध्य‑पूर्व में ऊर्जा सुरक्षा को बाधित कर सकती है, जिससे भारत की तेल आयात लागत और समुद्री व्यापार मार्गों पर दबाव बढ़ेगा। न्यू दिल्ली का ‘स्ट्रैटेजिक ऑटोनॉमी’ की अवधारणा इस मोड़ पर दोहरी चुनौती पेश करती है: या तो वह अमेरिका के दबाव के साथ सैन्य सहयोग गहरा करे, या अपनी स्वरक्षा क्षमताओं को आत्मनिर्भर बना कर शक्ति संतुलन में नई भूमिका अपनाए।
आलोचनात्मक नजरिए से देखें तो दोनों पक्षों के बयान वाकई में कूटनीतिक शेड्यूल की दोहरी मीनिंग को दर्शाते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने ‘सहयोगी नहीं होने’ का लहजा अपनाया, जबकि NATO प्रमुख ने ‘संदेश समझा गया’ की घोषणा की – यह एक प्रकार की ‘भौगोलिक बैंडवागन’ है जहाँ जिम्मेवारी और प्रतिबद्धता के बीच का अंतराल शब्दशः मापी जा रही है। इस तरह के दोहरा खेल NATO को अंदरूनी असंतोष की ओर ले जा सकता है, और वैश्विक शक्ति‑संतुलन में नया अनिश्चितता पैदा कर सकता है।
Published: May 4, 2026