ILO का सतत शिक्षण प्रस्ताव: नौकरी पर AI का प्रभाव रोकने की चुनौती
वर्ल्ड लेबर ऑर्गनाइज़ेशन (ILO) ने मंगलवार को एक नए अध्ययन के आधार पर सरकारों से आग्रह किया है कि वे जीवनभर सीखने को रणनीतिक नीति प्राथमिकता बनायें। इस आग्रह के पीछे एक ही कारण है—कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के तेज़ी से बढ़ते उपयोग से नौकरी‑बाजार में परिवर्तन का प्रकोप।
वर्तमान में, केवल 16 प्रतिशत कामगारों ने पिछले वर्ष में कोई संगठित प्रशिक्षण या पुनः‑स्किलिंग कार्यक्रम में भाग लिया। यह आँकड़ा केवल एक आँकड़ा नहीं है; यह एक चेतावनी संकेत है कि अधिकांश कार्यबल AI‑संचालित व्यवधान का सामना करने के लिए तैयार नहीं है।
रिपोर्ट यह भी उजागर करती है कि सीखने की सुविधाएँ सामाजिक-आर्थिक बंधनों के कारण काफी असमान हैं। बड़े शहरों में स्थापित फर्में और सार्वजनिक संस्थान अक्सर मौफ़िक प्रशिक्षण प्रदान करते हैं, जबकि ग्रामीण और अनौपचारिक क्षेत्रों में काम करने वाले श्रमिकों को इस अवसर से वंचित रखा जाता है।
दुनिया भर में नीतिनिर्माताओं ने AI‑संबंधी नौकरी‑ह्रास की भविष्यवाणी को सुनने से पहले ही सतत शिक्षा के महत्व को कबूल किया है, फिर भी वास्तविक कदम अक्सर प्रतिबद्धता‑के‑बावजूद अधूरी योजना में ही सीमित रह जाते हैं। ILO की सिफ़ारिशों का अक्सर “चलो, एक कमीशन बनाते हैं” से बदनाम “क्या‑करें‑भाई?” तक का सफ़र देखना पड़ता है।
भारत के लिए यह संदेश दोहरी महत्त्व का है। भारतीय युवा‑जनसंख्या का बड़ी मात्रा में हिस्सा अभी भी अनौपचारिक क्षेत्र में व्यस्त है, जहाँ प्रशिक्षण सुविधाओं की कमी स्पष्ट है। साथ ही, सरकार ने पहले ही कौशल विकास के तहत कई पहलें शुरू की हैं, परन्तु उनके प्रभाव को मापना मुश्किल है। यदि वह 16‑प्रतिशत के विश्व औसत को पार नहीं कर पाएँगे, तो AI‑से समर्थनित औद्योगिक परिवर्तन के समय भारत को “कौशल‑अभाव” की दीवार टकरानी पड़ेगी।
तथ्य यह है कि AI‑संचालित ऑटोमेशन को रोकना या धीमा करना किसी भी सरकार के हाथ में नहीं। एकमात्र व्यावहारिक उपाय है कामगारों को निरंतर पुनः‑सशक्त बनाने के लिए एक लचीला, सुलभ और समान रूप से वितरित शिक्षण ढांचा तैयार करना। नहीं तो, “भविष्य का काम वही होगा जो मशीनें नहीं कर सकतीं” की सुनहरी वाक्यांश सिर्फ भाषण‑पुस्तकों तक सीमित रह जाएगी।
सारांश में, ILO का सतत शिक्षण पर ज़ोर केवल एक नीति‑संकेत नहीं, बल्कि एक ज़रूरी जीवनरेखा है। यदि सरकारें अपने शब्द‑कोश को वास्तविक कार्य‑परिचालन में बदलें, तो ही AI‑का प्रभाव नौकरी‑बाजार में “समुदाय‑सुरक्षित” रूप से नियंत्रित किया जा सकेगा। अन्यथा, हम सब मिलकर देखेंगे कि तकनीक के “नयी नौकरियों” का केवल वादे ही रह जाएँगे, जबकि अधिकांश कामगार पुराने कामों की लाली से जूझते रहेंगे।
Published: May 6, 2026