Apple ने CCI पर न्यायिक अधिकार से अधिक हस्तक्षेप का आरोप, भारत में एंटीट्रस्ट विवाद गरम
जाने-माने अमेरिकी टेक जुक्ती Apple ने 3 मई 2026 को भारत की प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) के खिलाफ तीखा बयान दिया, जिसमें कहा गया कि आयोग ने न्यायिक प्रक्रियाओं से आगे बढ़ कर कंपनी की वित्तीय जानकारी को जबरन माँगा, जिससे वह ‘न्यायिक अधिकार से अधिक’ हो गया। यह विवाद तब और गर्म हो गया जब CCI ने 2024 से Apple को उसके App Store नीतियों के कारण बेजा शक्ति के दुरुपयोग के आरोप पर दंड‑निर्धारण के लिये आवश्यक आँकड़े देने को कहा।
ऐसे में, Apple की शिकायत का आधार यह है कि प्रतिस्पर्धा आयोग ने बिना किसी कोर्ट के आदेश के ही कंपनी के राजस्व‑विवरण, App Store से जुड़े शुल्क तथा विशिष्ट ग्राहक‑डाटा की मांग की। कंपनी के अनुसार, यह कदम भारतीय न्यायिक प्रणाली के अनुशासन को नज़रअंदाज़ करता है और ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई न्यायालय ‘अपराध’ के पहले ही चरण में ही दण्ड‑निर्धारण के लिये साक्ष्य जमा कर लेता हो।
वाइड‑रेंज में देखे जाने वाले ग्लोबल एंटीट्रस्ट प्रवाह को देखते हुए, भारत की स्थिति विशेष रूप से दिलचस्प है। यूरोपीय संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े बाजारों में भी Apple के App Store मॉडल को लेकर टेंशन चल रहा है। परंतु भारत में यह टेंशन दोहरी धारा में बँधता है: एक ओर देश का ‘डिजिटल इंडिया’ एजेंडा, जो घरेलू स्टार्ट‑अप्स को सशक्त बनाने की कोशिश करता है, और दूसरी ओर Apple जैसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के लिए निरपेक्ष नियमों का दावापत्र।
ऐतिहासिक रूप से, CCI ने भारतीय उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिये कई बार बड़ी जुर्माने ठुकरा दिए हैं—जैसे 2022 में एप्पल के एप्प‑इकोसिस्टम को ‘एकाधिकार‑दुरुपयोग’ का टैग दिया गया था। पर इस बार, Apple ने कहा कि उसने सभी आवश्यक सहयोग दिया, परन्तु CCI की मांगें “आइए‑से‑जटिल” प्रक्रियाएँ बन रही हैं। यह स्थिति न केवल दोनो संस्थाओं के बीच सत्ता-सम्बन्धों को उजागर करती है, बल्कि भारतीय न्यायिक संस्थानों की एंटीट्रस्ट नीतियों को भी प्रश्न में डालती है, जहाँ अनिवार्य ‘डाटा‑डिस्क्लोजर’ को कभी‑कभी ‘आधारभूत अधिकार‑हिंसा’ के रूप में देखा जाता है।
भारत के उपभोक्ता इस विखराव के बीच अनिच्छुक रह पाए हैं। iPhone और iPad का भारतीय बाजार में हिस्सेदारी 15‑20% के बीच रहने के बावजूद, इन उपकरणों पर चलने वाले ऐप्स का अधिकांश हिस्सा Apple के नियमन के अधीन है। यदि CCI गंभीर दंड लगाता है तो Apple को अपने App Store शुल्क (30%) को घटाने या भारतीय कंपनियों को अधिक स्वतंत्रता देने के लिये मजबूर होना पड़ेगा—ऐसा कुछ जो भारतीय स्टार्ट‑अप्स के लिए सालों से ‘सुबह की पहली किरन’ प्रतीत होता है।
अंत में, यह विवाद दर्शाता है कि वैश्विक महाशक्तियों की नियामक निकायों और देश-विशिष्ट प्रतिस्पर्धा संस्थाओं के बीच ‘न्यायिक अधिकार’ की सीमाएँ घटती ही जा रही हैं। जहाँ भारत अपने डिजिटल-राष्ट्र निर्माण के लिये सटीक, पारदर्शी और सुसंगत नियम बनाए रखने की कोशिश कर रहा है, वहीं Apple जैसी कंपनियां ‘न्याय की सीमा’ को चुनौती देने के लिये सादे शब्दों में शिकायत कर रही हैं। इस बीच, भारतीय उपभोक्ता शायद ही देख पाएंगे कि ये शब्दावली उनके पॉकेट में कैसे परिलक्षित होंगी।
Published: May 4, 2026