AI डेटा‑सेंटर निर्माण में तकनीकी दिग्गजों को मिला नीले‑कॉलर मित्र
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की महाकाव्य दौड़ में अब केवल सॉफ़्टवेयर नहीं, बल्कि बड़े‑पैमाने पर निर्माण कार्य भी प्रमुख भूमिका निभा रहा है। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल और अमेज़न जैसी कंपनियों ने हाल ही में अमेरिकी बिल्डिंग ट्रेड यूनियनों के साथ सार्वजनिक सम्बन्ध (PR) समझौते कर लिए हैं – एक कदम जो दर्शाता है कि कारखाने की गरज को भी अब ब्रांड‑इमेज की फॉर्मूले में मिलाया जा रहा है।
संयुक्त राज्य में ‘इंटरनेशनल ब्रदरहूड ऑफ इलेक्ट्रिकल वर्कर्स’ (IBEW) और ‘यूनाइटेड ब्रदरहूड ऑफ कारपेंटर्स’ जैसे ट्रेड यूनियन लंबे समय से कामगारों की आवाज़ रहे हैं। अब उन्होंने तकनीकी दिग्गजों को ‘वर्कफोर्स पार्टनरशिप एग्रीमेंट’ या ‘कंस्ट्रक्शन एक्सीलेंस इनीशिएटिव’ के नाम पर सौदेबाज़ी की अनुमति दी है। इसका मुख्य उद्देश्य दो‑तरफ़ा लाभ: कंपनियों को श्रमिक‑हितैषी छवि मिली, जबकि यूनियन को नई सदस्यता और राजस्व‑धारा का रास्ता खुला।
व्यावहारिक रूप से, यह गठबंधन कई मायनों में दिखावे के अलावा बहुत कम बदलता है। डेटा सेंटर की निर्माण‑साइटों पर अक्सर तेज़ी से काम पूरा करने की दबाव, पर्यावरण‑नियमन की चुनौतियां और ऊर्जा‑स्रोत की स्थिरता के सवाल रहता है। वहीँ यूनियन‑कंपनी समझौते अक्सर ‘स्थानीय रोजगार को प्राथमिकता’ के शब्दों में छुपे होते हैं, जबकि वास्तविक अनुबंध में उप‑ठेकेदारों के कामगार कई बार ‘नॉन‑अस्सोशिएटेड’ श्रेणी में रह जाते हैं। इस स्थिति को देखते हुए श्रमिक अधिकार विशेषज्ञ तंज़ के साथ कहते हैं, “अगर हाई‑टेक कंपनियाँ अपना डेटा‑सेंटर ‘ग्रीन’ बना कर दिखा रही हैं, तो कामगारों को ‘ग्रीन‑जॉब’ की गारंटी मिलती है या नहीं, यह तो अभी भी सवालिया‑सवालिया है।”
नीति‑परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो बाइडेन प्रशासन के ‘इन्फ्लेशन रिडक्शन एक्ट’ और ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर बिल’ ने घरेलू डेटा‑सेंटर निर्माण को कर‑छूट और सबसिडी के माध्यम से तेज़ करने का प्रयोजन रखा है। इस दिशा में निजी‑सार्वजनिक भागीदारी (PPP) को बढ़ावा दिया जा रहा है, जिससे तकनीकी कंपनियों को राजकोषीय राहत के साथ श्रमिक‑सुरक्षा के स्वर को भी ‘ब्लू‑कॉरर‑फ़्रेंडली’ दिखाना अनिवार्य हो गया है।
भारत की बात करें तो इस प्रवृत्ति से हमारा भी भागीदार नहीं है। इन्फोसिस, टीसीएस, जियो‑साइबर एफ़्ज़े जैसे घरेलू दिग्गज अब अपने AI‑संचालित डेटा‑सेंटरों के निर्माण में थोक‑मात्रा में विदेशी उपकरण और पेशेवर प्रबंधन का उपयोग कर रहे हैं। हालिया मंत्रालय के ‘उच्च‑तकनीकी निर्माण कौशल विकास’ दिशा‑निर्देशों ने भारतीय निर्माण श्रमिकों को डिजिटल‑इन्फ्रास्ट्रक्चर में अपस्किल करने का लक्ष्य रखा है, परन्तु यूनियन‑आधारित संगठित शक्ति अभी तक पुऱानी ढर्रेल‑रूपी नीतियों के जाल में फँसी हुई है।
यदि भारत इस वैश्विक डेटा‑सेंटर निर्माण के दौर में एक विश्वसनीय ‘ग्लोबल सिविल रेज़िलियंस’ के रूप में उभरना चाहता है, तो वह केवल तकनीकी निवेश ही नहीं, बल्कि श्रमिक अधिकार, पर्यावरण मानक और पारदर्शी अनुबंध‑प्रक्रिया में भी समान कदम उठाएगा। अन्यथा, विदेशी दिग्गजों के ‘ब्लू‑कॉरर‑अलाय’ की नकल में भारत के कामगार ‘डिज़िटल‑डायटेन्यी’ बनकर रह सकते हैं – यानी दिखावे में हरे, वास्तविकता में बेरंग।
Published: May 4, 2026