2026 फीफ़ा विश्व कप के प्रसारण अधिकारों पर भारत और चीन में सौदे अभी तक नहीं हुए
फीफ़ा ने पाँच मई को बताया कि अब तक भारत और चीन में 2026 विश्व कप के टेलीविज़न अधिकारों के लिये कोई औपचारिक समझौता नहीं हो पाया है, जबकि टूर्नामेंट का उद्घाटन शॉर्टली दो महीने बाद ही होने वाला है। दोनों देशों की बातचीत अभी चल रही है, लेकिन अंतिम समझौता नहीं बंध पाया।
भारत में पहले के टूर्नामेंटों को सोनी पिक्चर्स नेटवर्क्स जैसी प्राज्ज्वलित प्रीमियर चैनलों ने प्रसारित किया था। आज के डिजिटल‑उन्मुख विज्ञापन बाजार में, जहाँ इंडियन प्रीमियर लीग (आई पी एल) के अधिकारों ने लाखों दर्शकों को अपनी ओर आकर्षित किया है, ऐसा प्रतीत होता है कि फुटबॉल के लिए समान मूल्यांकन अभी तक नहीं मिला। ओटीटी नियमों में तेज़ी से बदलाव, विदेशी प्लेटफ़ॉर्मों पर डेटा‑संचयन पर सरकारी निगरानी, और राष्ट्रीय प्रसारकों की कीमत‑फ़ाइलों में असहमति ने इस अटकाव को बढ़ा दिया है।
चीन में मामला थोड़ा अलग है: राज्य‑नियंत्रित सीटीवी और निजी स्ट्रीमिंग दिग्गजों के बीच अधिकारों की बँटवारा एक राजनैतिक खेल बन गया है। बीते दो दशकों में चीन ने बड़े खेल आयोजनों को ‘हृदय‑अनुबंधन’ के साधन के रूप में इस्तेमाल किया है, पर अब परदेशी फुटबॉल की टोकन‑मूल्य में जाँच‑परख की जा रही है। एक अधिकारी ने कहा कि “फीफ़ा के अधिकारों को राष्ट्रीय सुरक्षा‑मानकों के साथ संरेखित करना आवश्यक है”, जिससे बयान‑से‑बयान तक प्रेडिक्टेबल लंबी प्रक्रिया बन गई है।
फीफ़ा के लिए यह दुविधा सिर्फ राजस्व‑घोटाला नहीं है। 2022‑2023 के विश्व कपों ने कुल टीवी अधिकारों से लगभग 3 बिलियन यूरो की कमाई की थी, जिसमें भारत‑चीन जैसे दो बड़े बाजारों की हिस्सेदारी 20 % से अधिक थी। अब जब ये हिस्से अनिश्चित हैं, तो विश्व कप का समग्र वित्तीय मॉडल थोड़ा हिल सकता है—एक ऐसी बात जो अभूतपूर्व नहीं, लेकिन फिर भी “ब्यालों की रेत में चोरों की सौदाबाज़ी” जैसा महसूस होती है।
ऐसी ही ‘विचारशीलता’ की बात करते हुए, उल्लेखनीय है कि यूरोप में कई बड़े ब्रॉडकास्टर और नई‑नई स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म, जो अक्सर फीफ़ा की “ट्रांसपेरेंसी” को लेकर आलोचना का शिकार होते हैं, वे भी इस सत्र में बड़तरीके बनाम‑बनाते नहीं देख पाते। कड़ा नियंत्रण, तंग वार्ता‑तंत्र, और अंत में कुछ ही महीनों में शुरू होने वाला बड़ा इवेंट—इन्हीं परिस्थितियों में फ़ीफ़ा का “कनेक्टेड” मॉडल बतौर ‘मरम्मतकार’ थोड़ा असहज दिखता है।
भारत के दर्शकों के लिये दो‑तीन संभावनाएँ हैं: या तो मौजूदा डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों पर रैपर-से-टैम्पर साइड‑स्ट्रीमिंग देखेंगे, या फिर अवैध स्ट्रिमिंग के माध्यम से मैच पकड़ेंगे—जो न केवल बौद्धिक संपदा के उल्लंघन को बढ़ावा देता है, बल्कि फ़ीफ़ा के ‘समान अवसर’ के तर्क को भी धूमिल कर देता है। चीन में भी, अगर अधिकारों में देर से भी कोई समझौता हुआ, तो उसके परिणामस्वरूप दर्शकों को आधिकारिक प्रसारण की जगह डेस्कटॉप‑गैजेट पर “अस्पष्ट रूप” के स्रोतों से सामग्री देखनी पड़ सकती है।
इस मूलभूत असंतुलन की ओर इशारा करते हुए, अंतरराष्ट्रीय खेल नीति विश्लेषक कहते हैं, “फीफ़ा ने मानचित्र पर बड़े जनसंख्या वाले दो महत्वाकांक्षी बाजारों को चिह्नित किया है, पर अब वह अपनी खुद की रेखा‑उपर्युक्त गाइडलाइन के साथ उनका ‘ड्राफ्ट’ नहीं बना पा रहा है।” ऐसा कदम न केवल फीफ़ा की आर्थिक स्थिरता को चुनौती देता है, बल्कि वैश्विक खेल‑संचार की व्यावसायिक व्याख्या पर भी सवाल उठाता है।
संक्षेप में, जब विश्व कप अभी शुरू होने को है, तब भारत‑चीन के प्रसारण अधिकारों का अनिश्चित सफ़र फीफ़ा की “विश्वसनीयता” के लिए एक तिकड़ी‑टेस्ट बन गया है—और संभव है कि इस ‘टेस्ट’ के परिणाम अगले बड़े अंतरराष्ट्रीय खेल को लेकर वार्ता‑टेबल पर नई तरह की शर्तें तय करेंगे।
Published: May 5, 2026