हर्मुज में तनाव से भारतीय जनता को हुई कड़ी चुनौतियां, प्रशासनिक कार्रवाई को मिला सवाल
संयुक्त राज्य अमेरिका ने ‘प्रोजेक्ट फ्रीडम’ नामक नौसैनिक ऑपरेशन शुरू किया, जिससे इरान के साथ हर्मुझ जलडमरूमध्य में जहाज़ों को सुरक्षित करने का दावा किया गया। इरान ने इस कदमी को cease‑fire का उल्लंघन बताते हुए कड़ा विरोध किया। इस द्विपक्षीय झड़ा ने एक निर्मल समुद्री मार्ग को अस्थायी रूप से असुरक्षित बना दिया, जो भारत की ऊर्जा आयात का अर्ध‑आधार है।
हर्मुज की अनिश्चितता के कारण तेल सीमित रूप से पहुँच रहा है, जिससे भारत में पेट्रोल और डीज़ल की कीमतों में तत्काल उछाल दर्ज हुआ। आम आदमी की रोज़मर्रा की ज़रूरतें—सार्वजनिक परिवहन, स्कूल के बस, छोटे औद्योगिक इकाई—सब प्रभावित हैं। ईंधन पर बढ़ती खर्च ने किचन गैस की कीमतें भी कूदते देखी, और गरीब वर्ग के जीवन‑स्तर पर सीधा असर पड़ा।
ऐसे परिप्रेक्ष्य में केंद्र सरकार ने “रक्षा, कूटनीति और आर्थिक स्थिरता” के तीन स्तंभों पर आधारित ‘संयुक्त उपाय’ का उल्लेख किया, परंतु विस्तृत योजना नहीं दी गई। कई विशेषज्ञों ने कहा कि बिना स्पष्ट समुद्री सुरक्षा प्रोटोकॉल और वैकल्पिक तेल स्रोतों की व्यवस्था के, सरकार का बयान केवल कागज़ी शब्द रह गया। दरअसल, पिछले साल ही तेल आयात पर विविधीकरण के लिए धड़कते बुनियादी ढांचे की कमी को लेकर कई संसद प्रश्न उठे थे, पर इस बार उन्हीं सवालों का दोहराव हुआ।
व्यावहारिक स्तर पर, कई बंदरगाहों ने निर्यात‑आयात की गति घटते देखी, जिससे छोटे व्यवसायियों की कमाई में कटौती हुई। शिक्षा क्षेत्र पर असर उतना ही स्पष्ट है—स्कूल बसों की दूरी बढ़ी, छात्र देर से पहुंचते हैं, और कई ग्रामीण स्कूलों को वैकल्पिक बिजली स्रोतों के लिए अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है। स्वास्थ्य पर भी दुष्प्रभाव दिखते हैं; तेल की कीमतों में वृद्धि के कारण ट्रांसपोर्ट खर्च बढ़ा, जिससे इमरजेंसी सेवाओं की पहुँच में देरी की संभावना बढ़ गई।
इस गंभीर स्थिति में प्रशासन की प्रतिक्रिया पर अक्सर “सरकार ने तो जलडमरूमध्य को ‘तिरछे’ देखा, पर जनता को नहीं देखा” जैसी सूखी व्यंग्य सुनाई देती है। जबकि विदेश नीति में तेज़ी से निर्णय लेना आवश्यक है, वही निर्णय आम नागरिक को अनजाने में बोझिल कर देता है। इस परिदृश्य में सुनियोजित आकस्मिक योजना, वैकल्पिक इंधन स्रोतों की तेजी से पूर्ति, और राष्ट्रीय तेल भंडारण क्षमता को बढ़ाने की आवश्यकता स्पष्ट है, परंतु नीति‑निर्माताओं की चुप्पी इस बात का संकेत देती है कि समय-समय पर “जवाबदेही” शब्द को केवल आधिकारिक बयानों में ही रखा जा रहा है।
भविष्य में यदि हर्मुज की अस्थिरता जारी रही, तो भारत को न केवल आर्थिक राहत के उपायों में तेज़ी लानी होगी, बल्कि सामाजिक सुरक्षा जाल को सुदृढ़ करने के साथ-साथ नौसैनिक सहयोग और समुद्री चेतावनी प्रणालियों में भी निवेश करना अनिवार्य हो जाएगा। तभी इस जटिल अंतरराष्ट्रीय संघर्ष के प्रतिध्वनि को आम जनता की रोज़मर्रा की ज़िंदगियों पर कम किया जा सकेगा।
Published: May 4, 2026