जो होना ही था, उसे दर्ज करता, देखता और सवाल करता समाचार मंच

Category: समाज

विज्ञापन

पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?

आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें

हृदय विशेषज्ञों ने अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड भोजन को घटाने के लिये घर में अधिक पकाने की सलाह दी

राष्ट्रीय स्तर पर जारी किए गए ‘क्लिनिकल कंसेंसस स्टेटमेंट’ में प्रमुख कार्डियोलॉजिस्ट समूह ने भारतीय जनसंख्या के सामने एक स्पष्ट संदेश रखा: अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड फूड (UPF) का सेवन घटाने के लिये घर पर भोजन बनाना, रात के देर समय खाने से बचना और खाने को धीरे‑धीरे चबाना आवश्यक है।

उच्च रक्तचाप, मोटापा और हृदय रोगों की बढ़ती प्रवृत्ति के पीछे UPF का योगदान अब वैज्ञानिक रूप से स्थापित हो चुका है। शहरी उपभोक्ता वर्ग, जहाँ फास्ट‑फूड, तैयार स्नैक्स और प्री‑पैकेज्ड भोज्य पदार्थों की उपलब्धता अत्यधिक है, वे इस सलाह के मुख्य लक्षित वर्ग हैं। इसी के साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी प्रसंस्कृत भोजन का बाजार विस्तार हो रहा है, जिससे यह स्वास्थ्य संकेत सभी वर्गों के लिये प्रासंगिक बन गया है।

समाज में मौजूदा असमानता के परिप्रेक्ष्य में यह सलाह दोहरी चुनौती लेकर आती है। जबकि मध्य‑वर्गीय परिवारों के पास घर में पकाने के लिये आवश्यक समय और संसाधन हो सकते हैं, फिर भी वे अक्सर काम‑काज एवं शिफ्ट‑जॉब के कारण देर रात तक खा लेते हैं। वहीं शहरी स्लम और श्रमिक वर्ग में किचन सुविधाओं का अभाव, अस्थिर कार्य‑समय और किफायती तैयार भोजन की उपलब्धता इस व्यवहार को और मजबूर बनाती है।

सरकारी स्तर पर अब तक कोई विशिष्ट नीति नहीं आई है जो अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड खाद्य की बिक्री या विज्ञापन पर सख्त प्रतिबंध लगाए। मौजूदा पोषण कार्यक्रम मुख्यतः कुपोषण और औषधीय सप्लीमेंटेशन पर केन्द्रित रहे हैं, जबकि ‘प्रोसेस्ड‑फूड का बढ़ता बोझ’ अभी तक सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेन्डा में स्पष्ट रूप से नहीं दिखा। यह खाली जगह ही है जहाँ विशेषज्ञों ने प्रशासनिक लापरवाही पर संकेत दिया है: “अगर स्वास्थ्य मंत्रालय को हृदय रोग रोकथाम में असली कदम उठाने हैं, तो नीतियों को केवल कुपोषण से नहीं, बल्कि प्रोसेस्ड फ़ूड के अतियुक्त सेवन से भी रोकना चाहिए।”

व्यंग्यात्मक रूप से कहा जाए तो, ‘फ्रेंच फ्राइज़ पर टैक्स’ जैसी छोटी‑छोटी पहलें अक्सर ही कागज़ पर ही रह जाती हैं, जबकि उन ही स्नैक स्टॉलों पर निरंतर विज्ञापन और सस्ती कीमतें जनता को आकर्षित करती रहती हैं। यह इस बात की याद दिलाता है कि नियामक कायदे‑कानून बनाते हैं, पर उनका कार्यान्वयन अक्सर ‘खाली बर्तन’ जैसा रहता है।

सार्वजनिक हित की दृष्टि से यह सन्देश केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिये ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य खर्च को नियंत्रित करने के लिये भी महत्त्वपूर्ण है। हृदय रोगों की बढ़ती लागत को देखते हुए, निवारक उपाय—जैसे घर का भोजन, समय पर खाने की आदतें, और उचित चबाना—भविष्य में लाखों रोगी सत्रों और अस्पताल खर्चों में कमी ला सकते हैं।

अंत में, विशेषज्ञ समूह ने यह आशा जताई है कि इस पहल को न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य जागरूकता के तौर पर, बल्कि नीति‑निर्माताओं के लिये एक ‘सिर्फ़ शब्द नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई’ का आह्वान माना जाए। तभी भारत में ‘अल्ट्रा‑प्रोसेस्ड भोजन’ की लहर को रोककर, स्वस्थ दिलों और उत्पादक जनसंख्या का निर्माण संभव हो पाएगा।

Published: May 7, 2026