हृदय रोगग्रस्त बच्चों के कल्याण में स्वैच्छिक सहयोग की भूमिका और सरकारी कमियों पर सवाल
पिछले सप्ताह एक 72 साल की सामाजिक कार्यकर्ता का निधन हो गया, जिन्होंने दो दशकों से अधिक समय तक बच्चों के हृदय रोग से जुड़े एक राष्ट्रीय संघ (ACHD) के लिए निःस्वार्थ सेवा प्रदान की। अपने दो बच्चों को जन्म से ही हृदय रोग का सामना करना पड़ा था, जिससे वह स्वयं इस संघर्ष को समझते हुए समान परिस्थितियों में फंसे परिवारों के लिए समर्थन, मनोवैज्ञानिक सहयोग और अवकाश सुविधाएँ आयोजित करने लगीं।
उनकी व्यक्तिगत कहानी दर्शाती है कि भारत में जन्मजात हृदय रोग (CHD) की रोकथाम, निदान और उपचार के क्षेत्र में अब भी कितनी खाई मौजूद है। सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के अभाव में अधिकांश रोगी परिवारों को न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक तनाव का भी सामना करना पड़ता है। अस्पताल‑प्रदत्त चिकित्सा सेवाएँ पहुँच में हैं, परंतु रोगी‑परिवार को यात्रा, उपचार के बाद की पुनर्वास और स्कूल‑समाज में पुनः समायोजन हेतु पर्याप्त सार्वजनिक समर्थन नहीं मिलता।
ऐसे में स्वैच्छिक संगठनों पर रिश्तेदारों की आशा टिकी रहती है। उनका काम अक्सर सरकारी योजनाओं की ओवरलैपिंग या वैकल्पिक व्यवस्था बन जाता है। लेकिन यह विहंगम परिदृश्य दो सवाल उठाता है: पहला, क्या मौजूदा स्वास्थ्य योजनाओं में जन्मजात हृदय रोग को विशेष रूप से संबोधित किया गया है? दूसरा, क्या सामाजिक सुरक्षा जाल में ऐसे नाबालिग रोगियों के लिए विशिष्ट कल्याण पैकेज मौजूद हैं?
वर्तमान में, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) और विभिन्न राज्य‑स्तरीय स्वास्थ्य कार्यक्रमों में CHD पर सीमित बजट आवंटन है। कई शोधों ने यह दिखाया है कि पहले पाँच वर्ष में सही समय पर की गई हृदय सर्जरी रोगी की जीवन प्रत्याशा को दो गुना तक बढ़ा देती है, परंतु ऐसी सर्जरी की लागत के साथ पुनर्वास, दवाई‑प्रबंधन और शैक्षणिक सहयोग को अक्सर निजी दान या स्वयंसेवकों के हाथों में छोड़ दिया जाता है।
पर्याप्त बजट आवंटन के अभाव में, स्वयंसेवी कार्यकर्ता अक्सर अनौपचारिक नेटवर्क के माध्यम से रोगियों को दूरदराज के विशेषज्ञ केंद्रों तक पहुंचाते हैं, जिससे प्रशासकीय जवाबदेही और पारदर्शिता का प्रश्न उठता है। जब ऐसी मदद के लिए नियत सरकारी विभागों की असंगत प्रतिक्रियाएँ या देर‑से‑देर इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास का सामना करना पड़ता है, तो सामाजिक असमानता और वर्गीय विभाजन गहरा हो जाता है।
समाप्ति के निकट, यह स्पष्ट है कि व्यक्तिगत समर्पण न केवल प्रशंसा के पात्र है, बल्कि यह सामाजिक संरचना में मौजूद गंभीर नीति‑फासले की ओर इशारा भी करता है। सरकार को चाहिए कि वह जन्मजात हृदय रोग के लिए एक समग्र राष्ट्रीय रणनीति तैयार करे—जिसमें निदान‑स्क्रीनिंग, वित्तीय सुरक्षा, पोस्ट‑ऑपरेटिव पुनर्वास, शैक्षिक सहयोग और स्वैच्छिक संगठनों के साथ समन्वित सहयोग शामिल हो। तभी ऐसे निःस्वार्थ कार्यकर्ता की मेहनत केवल पूरक नहीं, बल्कि मूलभूत स्वास्थ्य तंत्र का अभिन्न भाग बन सकेगी।
Published: May 3, 2026