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हैंटा वायरस से बच निकले दो रोगियों ने कहा, 'जैसे पृथ्वी पर नरक'—स्वास्थ्य प्रणाली की चुप्पी पर सवाल
पिछले कुछ वर्षों में दो रोगियों ने बीते हर्दिओवायरस संक्रमण को ‘पृथ्वी पर नरक’ कह कर वर्णित किया। दोनों के लिए जीवित रहना अब भाग्य का खेल बन गया है, जबकि बीमारी का सामना करने में सार्वजनिक स्वास्थ्य तंत्र की जड़ें कमजोर साबित हुईं।
हैंटा वायरस, जो मुख्यतः जंगली चूहों के रुधिर और मल के संपर्क से फैलता है, ग्रामीण भारत में खेती‑बाड़ी, पशुपालन और वन्य‑जीव क्षेत्रों में रहने वाले वर्गों को प्रमुख रूप से प्रभावित करता है। लेकिन इस रोग की पहचान, रिपोर्टिंग और उपचार के लिये आवश्यक बुनियादी ढाँचा कई स्थानों पर अभी भी ‘छुपा हुआ’ है।
पहले रोगी, एक मध्यवर्ती प्रदेश के किसान, ने बताया कि शुरुआती लक्षण‑ज्वर, मांसपेशियों में दर्द और तीव्र सांस की तकलीफ़ को सर्दी‑जुकाम समझ कर घर में ही उपचार किया। दो हफ्तों बाद जब रोग बेपरवाह बढ़ा, तब ही उसे अंतिम-सीमा ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्र में भेजा गया। वहाँ डॉक्टरों के पास वायरस‑संदेह के लिये कोई परीक्षण किट नहीं थी; रोगी को निकटतम शहर के एंटी‑वायरल विभाग में भेजने में 48 घंटे तक का विलंब हुआ। परिणामस्वरूप श्वसन दुर्बलता ने उसे शीघ्र ही इंटेंसिव केयर यूनिट में स्थानांतरित कर दिया, जहाँ भी बिस्तर की कमी और एंटी‑वायरल दवाओं की सीमित उपलब्धता ने इलाज को और कठिन बना दिया।
दूसरे रोगी, एक वन्य‑जनजाति के महिला, ने समान त्रासदी का सामना किया। उन्होंने अपने घर के पास बिखरे कचरे में सर्दी‑जुकाम और उल्टी को साधारण बीमारी मान कर दवाइयों पर भरोसा किया, जबकि वास्तविक कारण एक बार-बार खींचे गए कुतरने के बाद उनके घर में चूहे की उपस्थिति थी। स्थानीय स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा वन रोग की चेतावनी मिलने के बाद भी, उन्हें रोगी को जिला अस्पताल में भेजने की प्रक्रिया में कई चरणों के काग़ज़ी प्रोटोकॉलों ने बाधा डाली, जिससे उपचार में बेतुकी देरी हुई।
इन दो मामलों से स्पष्ट है कि हैंटा वायरस को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर कोई ठोस नीतिगत दिशा‑निर्धारण नहीं है। जबकि इंटीग्रेटेड डिज़ीज़ सर्विलांस प्रोग्राम (IDSP) ने कई रोगों की निगरानी को मजबूती दी है, वायरस‑निर्दिष्ट सैंपलिंग, प्रशिक्षण और लैब क्षमताओं को पर्याप्त रूप से नहीं जोड़ा गया। परिणामस्वरूप, कई ग्रामीण क्षेत्रों में इस रोग की वास्तविक प्रसार दर अज्ञात बनी हुई है।
सरकारी घोषणाएँ अक्सर ‘स्वास्थ्य‑सुरक्षित भारत’ की ओर इशारा करती हैं, पर जमीन पर तो स्वास्थ्य केंद्रों में बुनियादी परीक्षण किटों की कमी, आकस्मिक समाधान के लिये केवल ‘शहर‑से‑सेवा’ मॉडल, और बुनियादी जल‑सफ़ाई व स्वच्छता योजनाओं का टुक‑टुकाव जैसा कार्यान्वयन देखा जाता है। यह वही ‘डिजिटलीकरण’ के बाद भी असफलता है, जहाँ मोबाइल ऐप से रोग की रिपोर्ट करने की सुविधा है, पर वास्तविक समय में परीक्षण या उपचार नहीं हो पाता।
विशेषज्ञों का मानना है कि हर्दिओवायरस जैसे लुप्त‑प्राय रोगों को नियंत्रण में लाने के लिए, वन‑उद्यमी, कृषि विभाग और स्वास्थ्य विभाग के बीच एकीकृत कार्यवाही आवश्यक है। छोटे‑छोटे रोगियों की पीड़ा को देखते हुए, यह सवाल उठता है कि क्या ‘संकटकालीन योजना’ के तहत स्थापित एम्बुलेंस सेवा को ग्रामीण इलाकों में तेज़ी से पहुँचाने के लिये उचित फंडिंग और प्रोटोकॉल मौजूद हैं या नहीं।
इन दो जीवित बचे रोगियों का कहना है कि उन्होंने अपनी जिंदगियों को बचाने में ‘समय’ सबसे बड़ा विरोधी था, न कि वायरस खुद। इस बात ने स्वास्थ्य प्रशासन की तैयारी और प्रतिप्रतिक्रिया की झलक को उजागर किया है। यदि नीतियों को वास्तविक मैदान में परीक्षण नहीं किया गया, तो किसी भी रोग की सच्ची रोकथाम संभव नहीं है।
इस प्रकार, हैंटा वायरस के शिकारों की कहानी न केवल व्यक्तिगत त्रासदी है, बल्कि एक सामाजिक चेतावनी भी—कि स्वास्थ्य सेवा में असमानता, बिखरी हुई निगरानी और प्रशासनिक अकार्यक्षमता को दूर किए बिना, ग्रामीण भारत में आने वाले किसी भी रोग को ‘नरक’ बनाकर ही समाप्त किया जा सकता है।
Published: May 7, 2026