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Category: समाज

हैंटावायरस पर समुद्र में हुई भरमार, भारतीय यात्रियों को मिली ढीली सरकारी प्रतिक्रिया

दक्षिण अमेरिकी लैंडमार्क से रवाना हुई MV Hondius ने शुरू में एक सम्मोहक समुद्री सफर का वादा किया था, परंतु हफ्तों बाद ही एक दुर्लभ हैंटावायरस के प्रकोप ने यात्रा को अस्त-व्यस्त कर दिया। जहाज पर कुल 78 पुष्टि किए गए रोगी रहे, जिनमें 22 भारतीय यात्रियों का नाम था, और इस बीच तीन घटनाएँ आगे बढ़ी, जहाँ रोगियों की मृत्यु हुई।

संकट के शुरुआती संकेत तब मिले जब दो यात्रियों ने अचानक तीव्र बुखार, थकान और श्वास लेने में कठिनाई की शिकायत की। जहाज के मेडिकल स्टाफ ने प्रारंभिक रूप से इसे सामान्य फ्लू समझा, जबकि वास्तविक कारण की पुष्टि के लिए लैब परीक्षण देर से ही उपलब्ध हुआ। परीक्षण में हैंटावायरस के जीन की पहचान से पता चला कि यह वायरस संभवतः दक्षिण अमेरिकी सतह पर मौजूद छोटे जीवों से आया था, जिनका संपर्क तीव्रता से यात्रा के दौरान हुआ था।

इसी बीच भारतीय विदेश मंत्रालय ने संकल्पित होकर एक आपातकालीन टीम भेजी, परंतु उनकी पहुंच में विफलता के कारण कई रोगी को उचित समय पर रोगी‑विमान से भारत लाया नहीं जा सका। कई रोगियों को निकटतम पोर्ट में ही इमरजेंसी क्वारंटीन सुविधा में रखा गया, जहाँ सीमित बायोसुरक्षा मानकों और अपर्याप्त आयरन‑फिल्टर वेंटिलेशन ने संक्रमण के प्रसार का खतरा बढ़ा दिया।

स्वास्थ्य मंत्रालय ने बाद में एक विशेष प्रोटोकॉल जारी किया, जिसमें बताया गया कि ऐसे अंतरराष्ट्रीय प्रकट होने वाले रोगों के लिए एर्‍टिक्यूलर ट्रैवल इम्बार्गो (ट्रैवल रोक) और क्वारंटीन केंद्रों की बुनियादी ढाँचा तैयार होना चाहिए। हालांकि, वास्तविक कार्यान्वयन में कई खामियां उजागर हुईं: क्वारंटीन केंद्रों में आवश्यक PPE (पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट) की कमी, रोगियों के प्रवास की निगरानी के लिये डिजिटल ट्रैकिंग उपकरणों का अभाव, तथा स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारीयों द्वारा देर से रिपोर्टिंग।

पारदर्शिता की कमी को लेकर सामाजिक मीडिया में गहरी आलोचना हुई। चिकित्सा विशेषज्ञों ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय समुद्री यात्रा पर नियंत्रण के लिये मौजूदा नियम अपर्याप्त हैं, और वैकल्पिक स्वास्थ्य‑सुरक्षा मानकों की तत्काल आवश्यकता है। उन्होंने यह भी इंगित किया कि भारत के विदेशी यात्रा‑सुरक्षा प्रोटोकॉल में एबोर्ड मेडिकल इक्विपमेंट के स्तर को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप नहीं किया गया है।

इन घटनाओं ने फिर से यह सवाल उठाया कि जब वैश्विक महामारी के बाद भी सीमित बायो‑सुरक्षा तैयारियों को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली की कमजोरी कहाँ तक पहुँच चुकी है। जबकि संकट‑समय में एक त्वरित अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता थी, वास्तविकता में प्रशासनिक देरी और असंगत प्रोटोकॉल ने कई जीवन को अनावश्यक जोखिम में डाल दिया।

भविष्य में ऐसे प्रसंगों से बचने के लिये, विशेषज्ञों ने सिफ़ारिश की है कि (i) सभी अंतरराष्ट्रीय यात्रा‑संकटों के लिये एकीकृत राष्ट्रीय आपातकालीन प्रतिक्रिया टास्क‑फोर्स का गठन किया जाए, (ii) क्वारंटीन सुविधाओं को उन्नत बायो‑सेफ्टी स्तर पर लाया जाए, और (iii) यात्रियों को वैकल्पिक यात्रा बीमा और स्वास्थ्य‑क्लेम प्रक्रिया से जोड़ कर उनके अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाये। तभी हम ऐसी “भुले‑भटके” महामारी स्थितियों से एक सच्ची और सुरक्षित यात्रा का वादा कर पाएँगे।

Published: May 6, 2026