विज्ञापन
पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ में वकील की आवश्यकता है?
आपराधिक मुकदमों, जमानत, गिरफ्तारी, एफआईआर, जांच और उच्च न्यायालयी कार्यवाही से जुड़े कानूनी मार्गदर्शन के लिए यहां क्लिक करें।
हैंटावायरस के शिकार दो रोगियों ने कहा, ‘ज़िंदगी बचे रहने की दया’
पिछले कुछ वर्षों में भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में हैंटावायरस के मामलों में हल्की‑सी वृद्धि दर्ज की जा रही है। इस संदर्भ में दो बची‑बची रोगियों ने बीबीसी को बताया कि उन्होंने इस गंभीर रोग से लड़ते‑लड़ते अपने जीवन को ‘विनाश के कगार’ पर पाया, परंतु अंततः जीवित रहना खुद में एक किस्म की दया समझते हैं।
हैंटावायरस उन छोटे स्तनधारी जानवरों, मुख्यतः जाल बँदियों (rodents) के मल‑मूत्र से मनुष्यों में संक्रमण करता है। अक्सर यह रोग जंगल‑के‑निकट रहने वाले किसानों, खेती‑बाड़ी करने वालों और वन्य‑उत्पाद एकत्र करने वाले श्रमिकों को प्रभावित करता है। शुरुआती लक्षण बुखार, सिहरन और मांसपेशियों में दर्द होते हैं, पर देर से पहचान होने पर फेफड़े‑वायु मार्ग की गंभीर क्षति (हेमोफेज़ी या ब्रेस्टिक प्न्यूनिया) हो सकती है, जिससे मृत्यु दर अत्यधिक होती है।
दरअसल, इन दो रोगियों ने बताया कि शुरुआती चरण में उनके लक्षण को फ्लू या साधारण बुखार समझ कर केवल सिम्पल परामर्श ही मिला। उचित परीक्षण के बिना दवाइयों का प्रयोग किया गया, जबकि सही समय पर पीसीआर (PCR) या एंटीबॉडी टेस्ट की व्यवस्था न होने के कारण रोग का पता केवल कई हफ्तों बाद लगा। इस देरी का बोझ न केवल रोगियों की शारीरिक शक्ति पर पड़ा, बल्कि उनके परिवारों को आर्थिक व सामाजिक कष्टों में भी धकेल दिया।
सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली में इस तरह की दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ प्रशासनिक लापरवाही के प्रश्न उठाती हैं। राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) ने 2024 में हैंटावायरस की रिपोर्टिंग को अनिवार्य किया था, परंतु कई राज्यीय स्वास्थ्य विभागों ने रोग‑निगरानी के लिये आवश्यक बुनियादी ढाँचा, जैसे मोबाइल लैब, रीयल‑टाईम डेटा एंट्री सिस्टम और स्थानीय स्वास्थ्य कर्मियों को प्रशिक्षण, नहीं कराया। परिणामस्वरूप, ग्रामीण स्तर पर केस‑डिटेक्शन और समय‑पर‑इंटरवेंशन में बड़ी कमी रही।
इन घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि न केवल रोग‑प्रवर्तन के लिए निवारक उपायों की कमी है, बल्कि रोगियों के पुनर्वास हेतु सामाजिक सुरक्षा जाल भी अपर्याप्त हैं। जब दो व्यक्तियों को अपने जीवन को ‘नरक के पन्ने’ जैसा कहना पड़ता है, तो यह समाज के उन वर्गों की आवाज़ बन जाता है जिन्हें अक्सर नीति‑निर्माण के दायरे से बाहर माना जाता है। ऐसे मामलों में उत्तरदायी संस्थानों को न केवल रोग‑निवारण को सुदृढ़ करना चाहिए, बल्कि पीड़ितों को शीघ्रतम इलाज, आर्थिक सहायता और मनो–सामाजिक संरक्षण भी प्रदान करना चाहिए। तभी “सुरक्षित स्वास्थ्य” की अवधारणा वास्तविकता बन सकेगी।
Published: May 7, 2026