सहायक मृत्यु पर सार्वजनिक राय को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए – नागरिक जूरी के निष्कर्ष
नफ्फिल्ड काउंसिल ऑन बायोएथिक्स ने 2024 में इंग्लैंड की पहली नागरिक जूरी का आयोजन किया, जिसका उद्देश्य सहायक मृत्यु (Assisted Dying) पर जनमत को सीधा‑सादा रूप में समझना था। इस प्रयोग में 30 जूरी सदस्यों को भारत के जनसंख्या‑आधारित अनुपात में चुना गया, जिससे विभिन्न आयु, लिंग, सामाजिक‑आर्थिक तथा भौगोलिक वर्गों की आवाज़ें समान रूप से प्रतिबिंबित हों। आठ हफ्तों के दौरान उन्होंने कुल 24 घंटे विशेषज्ञ साक्ष्यों को सुनने, विरोधी व समर्थक दृष्टिकोणों को समझने और समूह चर्चा में गहन विचार‑विमर्श किया।
परिणाम दर्शाते हैं कि बहुमत नागरिक सहानुभूति एवं व्यक्तिगत स्वायत्तता के आधार पर कड़े सुरक्षा उपायों के साथ सहायक मृत्यु को स्वीकार्य मानते हैं, परंतु इस प्रक्रिया में चिकित्सकीय जिम्मेदारी, पारिवारिक संरचना और दुरुपयोग के जोखिम को लेकर गहरी चिंताएं भी व्यक्त की गईं। दर्शकों ने केवल ‘हां’ या ‘ना’ का सरल उत्तर नहीं दिया; उन्होंने व्यवस्था‑संतुलन के साथ स्पष्ट नियामक ढाँचा, पारदर्शी निगरानी और पुनरावृत्ति‑पर‑पुनरावृत्ति समीक्षा की माँग की।
भारत में इस विषय पर न्यायालयिक एवं विधायी चर्चाएँ वर्षों से जारी हैं, परंतु जनसंवाद की कमी अक्सर नीति‑निर्माताओं को ‘अस्पष्ट तौर‑पर’ रहने का बहाना बनाती है। नागरिक जूरी के इस इंग्लैंड‑आधारित मॉडल से स्पष्ट संदेश मिलते हैं कि बड़े‑पैमाने पर किसी बायो‑एथिकल मुद्दे को सुलझाने के लिए केवल विशेषज्ञ समिति या राजनैतिक रीढ़ से काम नहीं चल सकता। राष्ट्रीय स्तर पर समान जनसर्वेक्षण या जूरी‑आधारित फ़ोरम का अभाव, सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों के जवाबदेही को कमजोर करता है।
दुर्भाग्यवश, प्रशासन अक्सर सार्वजनिक राय को ‘परामर्श’ की सतह पर रखकर निर्णय‑लेने की प्रक्रिया को ढीला कर देता है। जैसा कि कई मामलों में देखा गया है—एक ओर व्यापक बहस, दूसरी ओर ‘प्रोफ़ाइल‑लेज़र’ के रूप में नीति का टाल‑मटोल—सरकारी घोषणा‑पत्रों में काग़ज़ी वादे होते हैं, लेकिन उनके पीछे ठहरे कदमों की गिनती अक्सर शून्य रहती है। यह वही सूखा व्यंग्य है कि “जनमत की आग में पिघला हुआ स्याही, नीतियों के ड्राफ्ट पर केवल धुंधली छाप छोड़ती है”।
सार्वजनिक हित से जुड़े बायो‑मेडिकल प्रश्नों में पारदर्शिता, सबूत‑आधारित निर्णय और नागरिक सहभागिता के बिना कोई भी नीति सार्थक नहीं रह सकती। इंग्लैंड की इस पहल ने यह प्रमाणित किया कि जब जनता को सुना जाता है, तो सामाजिक‑नीतिक बुनियादों को सुदृढ़ करने के लिए ठोस ढाँचा बनाना संभव है—और यही भारतीय विधायी प्रक्रिया के लिए एक आवश्यक चेतावनी है। समय आ गया है कि संसद और स्वास्थ्य मंत्रालय समान‑प्रतिनिधित्व वाली नागरिक जूरियों के निष्कर्षों को नज़रअंदाज़ न करें, ताकि सहायक मृत्यु जैसी संवेदनशील विषय पर न्यायसंगत, सुरक्षित और जनता‑के‑विश्वासपरक नीति तैयार की जा सके।
Published: May 5, 2026